आत्म-परिचय

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तत्त्व : हिंदू संस्कृति और जीवन का उत्सव

“तत्त्व” के मूल केंद्र सनातन संस्कृति और हिन्दू जीवन-आचरण हैं, जिनका कि साझा स्वरूप ही “सनातन धर्म” की लोक-परिभाषा है। वस्तुतः धर्म की अति-समृद्ध अनुष्ठान, दर्शन, कला एवं साहित्य जैसी परंपराओं व उनके निर्मल स्वरूप का लोक-दर्शन, प्रसारण और मंगलगान ही “तत्त्व” का मूल उद्देश्य है। सनातन धर्म अनादि है, और अनंत भी! किंतु सनातन का आधुनिक स्वरूप बीती चार सहस्राब्दियों से अनवरत चली आ रही ज्ञान यात्रा का संग्रहालय है। वास्तव में, ये संग्रह सनातन पूर्वजों के ज्ञान एवं उनकी परस्पर निरीक्षण विधियों की एक अक्षत शृंखला को प्रस्तुत करता है। “तत्त्व” का प्रयास है कि हमारे आपके सामूहिक उद्यम से सनातन परंपरा का प्रस्तुतिकरण लोकभाषा में किया जा सके! और इस प्रक्रिया में यथासंभव यत्न रहेगा कि धर्म की अग्र-पूजनीय श्रुति, स्मृति और संहिता जैसी ग्रंथ परम्पराओं का भाव-अक्षरश: पालन हो।

यद्यपि हमारा नैष्ठिक झुकाव सनातन धर्म की ग्रंथ-लिखित परंपराओं की ओर है, किंतु “तत्त्व” सनातन की उस अद्भुत विविधता को भी प्रचुर सम्मान देता है, जिसके तहत हिंदू जनमानस ने धर्म का बड़ा ही सौहार्दपूर्ण अनुपालन किया है। अब चाहे वो एक आदिवासी का प्रथारूप धर्म हो, या कि एक वैष्णव का भक्तिभावपूर्ण धर्म, या हो एक नाथ योगी का तांत्रिक धर्म, अथवा पश्चिमी विश्व में व्यापक पैठ बना रहा योग-आध्यात्म धर्म हो। उक्त सभी स्वरूप व इनकी विविधताएँ हमारी प्राथमिकताएँ हैं, प्रतिबद्धताएँ हैं। साथ ही, हमारा एक उद्देश्य परम्परा, अनुष्ठान, उत्सव एवं कला के उन विविध स्वरूपों को लिपिबद्ध करना भी है, जो दुनिया भर में फैले शतकोटि हिंदुओं के सामाजिक व धार्मिक जीवन को आकार प्रदान करते हैं।

“तत्त्व” के पन्नों में, इस विषय पर गहन खोजबीन व जाँच-पड़ताल की जाएगी कि सामाजिक-राजनीतिक जीवन के आधुनिक स्वरूपों से सनातन धर्म किस प्रकार सामंजस्य बैठाता है। इन आधुनिक स्वरूपों में राष्ट्र-राज्य, लोकतंत्र और पूंजीवाद जैसे विषय आते हैं, जिनका वैचारिक मूल पश्चिमी उदारवाद में निहित है। जबकि पश्चिमी उदारवाद और सनातन धर्म तो एकदूसरे से सर्वथा अनजान व्याप्तियाँ हैं। हालाँकि, सनातन की प्रकृति में सिद्धांतरूढ़ि नहीं है, और इस उदार प्रकृति ने धर्म को आधुनिकता के अनुकूल होने की सहजता भी अवश्य दी है, किंतु विचारणीय है कि ऐसे में कहीं धर्म की प्राणशक्ति तो नहीं खो गई? धर्म अपने वास्तविक स्वरूप से परे तो नहीं चला गया? चूँकि सनातन धर्म सह अस्तित्व के विरोधी व स्वयं को ही एकमात्र सत्य मानने वाले हठधर्मी अवयवों से अनवरत युद्धरत भी है। तो स्वरूप ध्वंस की ये प्रक्रिया अत्यंत तीव्र तो नहीं हो गई?

— “तत्त्व” के आलेखों में हम और आप मिलकर, ऐतिहासिक व समकालीन दोनों ही प्रकार के संदर्भों में इन मुद्दों पर प्रश्नोत्तरी करते रहेंगे।

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