ध्यान-योग

जब परमशान्त मन-मस्तिष्क के साहचर्य में पंच-इद्रियाँ स्थिर हो जाएँ, भले इसकी प्रेरणा मनुष्य के अंत:करण से संचालित न हो, तब भी, वैसी स्थिति को शिखर अवस्था कहते हैं।

इन्द्रियों पर दृढ़ नियंत्रण ही योग की लोक-मान्यता है।

- कठोपनिषद् (6.10-11)