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धर्म का लोक-प्रश्रय

तत्त्व : हिंदू संस्कृति और जीवन का उत्सव

अद्यतन, तत्त्व को दान की खोज नहीं है। वित्तीय मामलों में तत्त्व पूर्णरूपेण सक्षम है, और अपने धार्मिक उद्देश्यों में लाभ-निरपेक्ष भी!

तथापि, तत्त्व की ओर से हम अनुरोध करते हैं कि समाज के धार्मिक उद्देश्यों में अत्यंत लघु राशि का योगदान भी करते रहें। चूँकि प्रत्येक संस्कृति व धर्म को अपनी सतत उत्तरजीविता और विकास के लिए जिन महत्त्वपूर्ण संसाधनों की आवश्यकता होती है, वित्त उनमें से है। हिंदू धर्मशास्त्र, दर्शन, संगीत व स्मारक, यदि आज भी उपलब्ध हैं और समाज को सहज प्राप्त हैं, तो वस्तुतः इन सबके पार्श्व में हिंदू राजाओं, व्यवसायियों और शिल्प-समूहों द्वारा प्रदान किए गए संरक्षण का एक लंबा इतिहास निहित है। महाकवि कालिदास का समूचा संस्कृत साहित्य आज भी सहज प्राप्य है, चूँकि उन्हें विक्रम संवत् के प्रणेता उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य का प्रश्रय प्राप्त था। गोस्वामी तुलसीदास भी अपने रामचरितमानस के माध्यम से, लोक की आत्मा में उतर गए, चूँकि उन्हें राजस्थान और काशी के व्यवसायी वर्ग का प्रायोजन प्राप्त था। मध्यकाल में, समृद्ध व्यापारियों ने अपने आवास प्रांगणों को शिक्षण संस्थानों में बदल दिया था, ताकि छात्रों की बोध-प्रवृत्ति और समाज की अध्येता-वृत्ति में प्रगति हो। आक्रांता मुगलों के नाश पश्चात, रानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ और काशी विश्वनाथ सहित हमारे सभी विध्वस्त शिवमंदिरों के जीर्णोद्धार को प्रायोजित किया था। ठीक वैसे ही, मठ-मंदिरों व विद्या मंदिरों के निर्माण को प्रायोजित करने वाले कोल्हू-तैलकार, नाविक और लोहार जैसे शिल्पकार-समूहों के विशाल पुरातात्त्विक अभिलेख भी हमारे इतिहास में उपलब्ध हैं।

आधुनिक समय में भी ऐसे उद्धरणों की कमी नहीं! कलकत्ता की रानी रासमणि दास, जिन्होंने दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापना कर रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्यों के लघु परिकर को पर्याप्त प्रश्रय दिया। उसी परिकर से स्वामी विवेकानंद उभरे थे। स्वामी जी की अमेरिका यात्रा राजस्थान के खेतड़ी महाराज श्री अजीत सिंह द्वारा प्रायोजित थी, और कहना न होगा कि इस प्रश्रय के परिणाम अब सर्व प्रसिद्ध इतिहास हैं। आधुनिक युग में, योगाभ्यास की दुर्लभ परंपरा भी सर्वसुलभ है, चूँकि मैसूर महाराज ने महान योग शिक्षक श्री कृष्णमाचार्य को प्रायोजित किया, जिनके कि शिष्य बीकेएस अयंगर और पट्टाभि जॉइस हुए। वैसे ही एक प्रायोजक प्रसिद्ध व्यवसायी बिड़ला भी हुए, जिन्होंने गांधी, टैगोर और आरएसएस को प्रश्रय दिया था। एसएन गोयंका भी इसी पथ के पथिक थे, जिन्होंने ध्यान की एक विशेष तकनीक के ज्ञान-प्रसार हेतु एक बर्मी भिक्षु को प्रश्रय दिया किया था। इस तकनीक को आज विपश्यना कहते हैं। ऐसे उदाहरणों को संख्या अंतहीन है, इतनी कि गुणित-गुणोत्तर व्याख्या की जा सके!

कुल सारांश ये है कि यदि किसी भी संस्कृति अथवा सभ्यता का उद्देश्य सतत उत्तरजीविता और प्रसारण है, तो उसे पथ-प्रदर्शकों को प्रश्रय देना चाहिए। हिंदू परंपरा में संस्कृत विद्वान, वैदिक आचार्य, प्रशिक्षित पंडित, शास्त्रीय संगीतकार व नर्तक, लोक गायक, योग आचार्य, मंदिर वास्तुकार, पारंपरिक चित्रकार, कथा-वाचक, कला संरक्षक और कई अन्य प्रकार के लोग पथ-प्रदर्शक हो सकते हैं।

उपरोक्त सभी के लिए वित्त-प्रश्रय की आवश्यकता होती है। ये व्यवसाय स्व-वित्त पोषित नहीं होते हैं, वस्तुतः ये व्यवसाय ही नहीं होते। ये वृत्तियों के नहीं, प्रवृत्तियों के विषय होते हैं। आरंभिक दौर में, पथ-प्रदर्शकों का प्रश्रय प्रायोजन राजाओं, व्यवसायियों, शिल्पकार-समूहों अथवा प्रतिष्ठित मंदिरों के जिम्मे था। और ठीक ऐसे ही प्रायोजन को सर्व शुभ माना जाता था। दान पर बड़ा ही विशद संस्कृत साहित्य अभी तक अप्रकाशित ही है, जिसमें कि इसके सर्वोच्च पुण्य होने की स्थापना! दान का मूल अभिप्राय कुछ यों है कि धार्मिक परंपराओं के सुरक्षा संरक्षण हेतु किया जाने वाला दान, प्रतिफल में हमारे अपने सांस्कृतिक लोक-कल्याण को ही बल प्रदान करता रहा है। चूँकि सनातन संस्कृति ने विश्व को कई नवीन आयामों में समृद्ध किया है। वास्तव में, संस्कृति पहचान को चिह्नित करने सामूहिक एकता की जननी है, बल्कि तीव्रता से परिवर्तनशील इस संसार में, हमें ऐसा चिर-स्थिर स्थायित्व भी प्रदान करती है, जिसमें कि अपनी पितृभूमि और अपने समुदाय से लगाव समाहित हैं। अत्यंत प्रसिद्ध कथन है, जो कहता है कि “धर्मो रक्षति रक्षितः”, अर्थात् जिसका कि भावार्थ है : “रक्षित धर्म ही रक्षक की रक्षा करता है!”

यद्यपि आज हमारे पास हिंदू धर्म का समर्थन करने वाला कोई राजा नहीं है। हमारे सभी मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं (और कोई नहीं जानता कि पैसा कहाँ जाता है)। इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी के कारण जिस तीव्र गति से हमारे संपर्क पश्चिमी विश्व से हो रहे हैं, उसका परिणाम हमारे स्वाद, भोजन, भाषा और संस्कृति में महाघन परिवर्तन के रूप में दिख रहा है। प्रतीत होने लगा है कि हिंदू चेतना में पैतृक परंपराओं, अनुष्ठानों, उपासना पद्धतियों, शिल्पकलाओं और संगीत विधाओं के स्थान पर पश्चिम से आयातित उपभोक्तावादी संस्कृति का असीमित प्रवेश होता जा रहा है। आदर्शतया, दोनों के बीच एक संतुलन होना चाहिए! किंतु ये कोई निष्पक्ष क्रीड़ा स्थल नहीं है, चूँकि भारतीय संस्कृति केवल हमारे विश्वास और संरक्षण पर ही निर्भर है, जबकि पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति को विश्वव्यापी पूँजीवाद का समर्थन प्राप्त है। और ये समस्या इस तथ्य को जानने के पश्चात् कई गुणा विस्तृत मालूम होती है, कि हमारी शिक्षा प्रणाली हमारी अपनी संस्कृति से ठीक विपरीत है!

ऐसे में, ये अब और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि हम अपने महान पूर्वजों के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए, हिंदू धर्म और धर्म की संस्थाओं को संरक्षित करने की परंपरा को बनाए रखें। तत्त्व की ओर से, हम अनुरोध करते हैं कि आप उन लोगों और संस्थाओं को धन (भले ही एक लघु राशि) का दान अवश्य करें, जो धर्म के प्रचारण-प्रसारण हेतु अपने जीवन को यज्ञ बना रहे हैं। आप चाहें तो धर्म को जानने समझने की इच्छा रखने वालों, चाहे वे ईसाई हों अथवा मुस्लिम, को गीताप्रेस की धार्मिक पुस्तकों का भी दान कर सकते हैं।यदि आपको धार्मिक कार्यों में योगदान के विषय में कोई सुझाव चाहिए, तो कृपया contact@tattvamag.org पर हमसे संपर्क करें। तत्त्व, वस्तुतः एक समुदाय के निर्माण का प्रारंभिक प्रयास है, जिसकी मान्यता में हमारे धर्म का संरक्षण और प्रचार ही सर्वोच्च पुण्य है।

आपका अभिन्न मित्र
मनीष माहेश्वरी
(संस्थापक संपादक)