गणेशोत्सव

गणेश शुभता-नव्यता के अग्र-पूजनीय प्रतीत हैं! गौ, गंगा और गायत्री की उपासक जाति ने “श्री गणेशाय नम:” पर जैसा ऐक्य प्रकट किया है, वैसा किसी अन्य देव के लिए नहीं दीखता।

11 मिनट वाच्य
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णेशोत्सव क्या होता है? : महामाता पार्वती और भगवान् शिव के अनुज पुत्र विनायक का दस-दिवसीय जन्मोत्सव ही वास्तव में गणेशोत्सव कहलाता है।

गणेशोत्सव कब होता है? : इसका दशोत्सव का आयोजन भाद्रपद के उजियार पाख में होता है, चतुर्थी से चतुर्दशी तक।

गणेशोत्सव कब है? : संवत् 2078 वि० का गणेशोत्सव का आयोजन ईसवी 2021 के सितम्बर माह के दिनांक दस से आरंभ होगा और दिनांक उन्नीस पर्यंत चलेगा।

उत्सव प्रकरण श्री-गणेश

ग-वर्ण से हिंदू जनमानस का सामीप्य मानो अकथनीय है! गौ, गंगा और गायत्री की उपासक जाति ने ग-कार व्याप्तियों को कैसा सिरमौर बनाया है, देखते ही बनता है। ग से गरुड, पक्षिराज गरुड! ग से गर्ग, संसार के रचयिता कृष्ण का नाम रचने वाले त्रिगर्ता के आचार्य गर्ग! और ग से गणेश, गणपति, गजानन: … शिव-शक्ति के यशस्वी पुत्र।

लोक मायनों में गणेश नव्यता के प्रतीत हैं, शुभता और मांगल्य अवसरों के अग्र-पूजनीय हैं। सम्प्रदाय, शास्त्र और मान्यताओं की विविधताओं के लिए जानी जाने वाली हिंदू जाति, अपने शुभ अवसरों पर प्रथम उच्चारित “श्री गणेशाय नम:” पर कैसा ऐक्य प्रकट करती है, कि वैसा किसी अन्य देव के लिए नहीं दीखता। कदाचित् यही कारण है कि श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे आदिपुरुषों का जन्मोत्सव भी मात्र एक दिन मनाने वाली हिंदू जाति, गणपति के जन्म का उत्सव दस-दिवस पर्यंत मनाती है।

विष्णु के उपासक वैष्णव, शिव के शैव और शक्ति के शाक्तों की ही लीक पर, गणपति को देवाधिदेव प्रतिष्ठित करने वाले सम्प्रदाय को गाणपत्य कहा जाता है। इस सम्प्रदाय के उपासना ग्रंथों में गणपति की स्तुति करने वाले वैदिक सूक्त प्रमुख हैं। साथ ही, गणपत्युपनिषद् व गणेश पुराण भी उपलब्ध है। शिवपुराण1शिवपुराण, चतुर्थ खंड, सत्रहवाँ अध्याय, श्लोक क्रमांक 47-57, मत्स्यपुराण2मत्स्य पुराण, 154-157 अध्याय, लिंगपुराण व वराहपुराण3वराहपुराण, तेईसवाँ अध्याय, श्लोक क्रमांक 18-59 भी गाणपत्य सम्प्रदाय के प्रयोजनमूलक प्रकरणों को समाहित करते हैं।

गणेशोत्सव-गवेषणा

यों तो गणेश समूचे आर्यावर्त में अग्र-पूजनीय हैं! किंतु सांस्कृतिक गह्वरता व आयोजन वैशाल्य की दृष्टि से देखा जाए, सर्वमहत्त उत्सव मराठाभूमि पर ही होता है। भला मराठाभूमि में ऐसा केंद्रीकरण क्यों? क्योंकि वहाँ का एक सिद्ध गणेश मंदिर अपने दौर में गाणपत्य संप्रदाय का केंद्र रहा है। मयूरों की अधिकता के कारण मंदिर विग्रह को मयूरेश्वर गणपति का नाम मिला और आसपास के ग्राम्यक्षेत्र को मोरगाँव कहकर पुकारा गया। मराठों की प्रसिद्ध अष्ट-विनायक यात्रा इसी मयूरेश्वर मंदिर से आरंभ होती है और फिर थेऊर, सिद्धटेक, रांजणगाँव, ओझर, लेण्याद्रि, महड़ और पाली जैसे स्थानों को समाहित करती है।

मोरगाँव के इसी आदि-विनायक विग्रह के सम्मान में, आज भी गणपति बप्पा का घोष “मोरया” पर समाप्त होता है : “गणपति बप्पा… मोरया!” और इसी मोरया नाम को मोरगाँव के निवासी वामनभट और पार्वती के पुत्र ने भी धारण किया। मोरया गोस्वामी, जो अपनी युवावस्था में ही प्रसिद्ध गृहस्थ संत हो गए थे। अव्वल तो उन्होंने मोरेश्वर मंदिर में कई वर्ष अर्चन किया! फिर थेऊर आ पहुँचे और अंततः पूना के निकट पवना नदी के किनारे बसे चिंचिवाड में अपना आश्रम बनाया। मोरया आश्रम पर संत तुकाराम और समर्थ गुरु रामदास का आवागमन सतत् हुआ करता था। दोनों ही जन मोरया गोसावी का सम्मान गुरु के समान किया करते थे। कालांतर में गणेशोत्सव की आरती बन जाने वाले मराठी गान “सुखकर्ता-दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची…” की रचना समर्थ गुरु रामदास ने इन्हीं मोरया गोसावी के सान्निध्य में चिंचिवाड आश्रम पर ही की थी।4अजीत वड़नेकर – शब्दों का सफर (मोरया)

वस्तुत: यही मयूरेश्वर गणपति मराठा पेशवाओं के कुलदेवता हैं। पूना के निवासी पेशवाओं के घरेलू प्रांगणों में गणेशोत्सव का पारिवारिक आयोजन किया जाता था। जब ऐसे नितांत पारिवारिक उत्सव की सूचना मराठा-गौरव छत्रपति शिवाजी महाराज को हुई, तो उन्होंने इस उत्सव में निहित सामाजिक ऐक्य की भावना का उपहार अपनी प्रजा को देने का निश्चय किया। अव्वल, स्वयं उन्होंने इसका आयोजन किया और “यथा राजा तथा प्रजा” की लीक पर मराठा जनमानस ने भी अपने छत्रपति और पेशवा का अनुसरण किया।

एक दौर ऐसा था, जब अद्यतन की ही भाँति गणेशोत्सव का सार्वजनिक आयोजन पूना समेत कई मराठा नगरों में किया जाता था! किंतु ब्रितानी आक्रांताओं और मराठा साम्राज्य के निपात के साथ ही गणेशोत्सव का सार्वजनिक आयोजन समाप्त हो गया, और ये उत्सव पुन: अपने नितांत व्यक्तिगत स्वरूप में पूना के शनिवार-वाडा तक ही अंत:प्रतिष्ठित हो गया।

और फिर सन् 1892 ई० में, भाऊसाहब लक्ष्मण ने उत्सव के आनंदमय इतिहास से धूल हटा कर, इसका सार्वजनिक आयोजन पूना में किया। इस उत्सव और इसके कारण समाज के परस्पर मेल-मिलाप की बढ़ोत्तरी में राष्ट्रवाद के संभाव्य उदय की सुगबुगाहट होने लगी। ठीक इसी मर्म के सिरे को थामकर सन् 1893 ई० में, एक मराठी अख़बार केसरी ने लक्ष्मण भाऊ के इस प्रयास-उत्सव की भूरि भूरि प्रशंसा की। इस अखबारी आलेख के लेखक थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक! और फिर दोनों महापुरुषों के सद्यत्नों से गणेशोत्सव को पुन: लोक-प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। शेष तो फिर कहन का इतिहास है, सत्यम् एको विद्वानो बहुधा वदंति।

मराठेतर गणेशोत्सव

यों तो गणेशोत्सव का सर्वमहत्त आयोजन मराठाभूमि पर ही होता है, किंतु फिर भी, बीती दो सदियों में हुए भूमंडलीकरण के कारण, ये आयोजन अब प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष, विशेषतया कर्क रेखा से नीचे के प्रदेशों में भी देखे जा रहे हैं।

आंध्रभूमि में, कनिपाकम के वरसिद्धि विनायक स्वामी मंदिर में गणेशोत्सव को ब्रह्मोत्सव कहकर पुकारा गया है, और स्थानीय तेलगू भाषा में चतुर्थी को चवीथी! न केवल नामवृद्धि हुई है, बल्कि उत्सव की दिवस-वृद्धि भी द्रष्टव्य होती है। इक्कीस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में गणपति विग्रह के लिए दक्षिण की लाक्षणिक शैलीगत रथयात्रा का आयोजन किया जाता है। विग्रह को पृथक् पृथक् वाहनों में कई-कई नगर फेरियाँ करवाई जाती हैं। सार्वजनिक उत्सव के साथ साथ, हिंदूजन अपने अपने घरों में नितांत व्यक्तिगत विनायक भी स्थापित करते हैं, जिन्हें स्थानीय तेलगू भाषा में “विनायकुडू” कहा जाता है। प्रमुखतया, विनायकुडू के दो स्वरूप हैं, जिनकी भिन्नता इस बात पर निर्भर है कि निर्माण में किस तत्त्व का प्रयोग हुआ। दक्कन की कृष्णमृदा (काली-मिट्टी) से निर्मित विग्रह को “मत्ति विनायकुडू” और विशुद्ध हल्दी से निर्मित विग्रह को “सिद्धि विनायकुडू” कहा जाता है।

कोंकण प्रदेश गोपराष्ट्र (अद्यतन, गोवा) पर रहे दीर्घकालीन मराठीय शासन के कारण यहाँ की संस्कृति और पर्व-व्रतोत्सव में मराठी झलक है! सो, इस गणेशोत्सव पर्व की भी बड़ी चहल-पहल रहती है। वस्तुतः यहाँ गणेशोत्सव को कुछ वैसे ही उत्सव पाँत जैसा मनाया जाता है, जैसे उत्तरभारत में दीपावली की रौल-चौल है। गोपभूमि के गणेशोत्सव का नाम “चवथ परब” है।5Purabhilekh-puratatva: Journal of the Directorate of Archives, Archaeology and Museum, Volume 2. Panaji-Goa: The Directorate, 1984. p. 94. हालाँकि उत्सव का आरंभ तृतीया को आयोजित शिव-पार्वती पूजन से हो जाया करता है! ठीक इसी लीक पर, कर्णाटभूमि का गणेशोत्सव भी है, जहां आरंभ ही ठीक एक दिन पूर्व गौरी तृतीया से होता है। गोवा का समूचा उत्सव, गोह की खाल से बनी घुमट की डमरू-सी डम-डम, पखावज की थाप और मजीरे की रुनझुन में आद्यांत डूबा हुआ रहता है। इस उत्सव पाँत में पंचमी का त्यौहार नव्याची पंचमी है, भाव की सरल ग्राह्यता के लिए इस पंचमी की तुलना पंजाब के बैसाखी पर्व से की जा सकती है। जहां बैसाखी फसल उत्सव का मूल अनाज गेहूँ होता है, वहीं नव्याची पंचमी चावल की नई खेप का फसल उत्सव मनाती है।

तमिलभूमि में गणेश चतुर्थी को पिल्लय्यर चतुर्थी कहकर पुकारा जाता है! द्रविड़ भाषाओं ने गणेश को “पिल्लई” क्योंकर कहा है? — इस बाबत एक सुदीर्घ विमर्श तमिल साहित्य में उपलब्ध है! तमिल में पिल्लई शब्द का भाव बालक के अर्थों में है, और पिल्लय्यर का भाव ऐसे बालक के अर्थ में है, जो उदारचेता है, भविष्य का धीरोदात्त नायक है। समकालीन भाषा-विज्ञानियों ने पल्लू, पेल्ला एवं पेल्ल जैसे तमिल शब्द द्रविड़ भाषा परिवार में खोजे हैं, जिनका तात्पर्य अब दांत अथवा नोंकदार दांत से जुड़ गया है, विशेषतया हाथीदांत से!6A.K. Narain – Ganesha : The Idea and the Icon, Page No. 25 इन सभी शब्दों का धातुरूप पालि भाषा का शब्द पिल्लक प्रतीत होता है। वहाँ इस शब्द से गज, या कहें कि युवा गज को चिह्नित किया गया है।7Anita Raina Thapan – Understanding Gaṇapati : Insights into the Dynamics of a Cult. Page No. 62 New Delhi: Manohar Publishers. बौद्धों के धर्म साहित्य की आधिकारिक भाषा होने के कारण, पालि भाषा का गज विमर्श जगत्प्रसिद्ध है।

तमिल सरकार ने प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से होने वाले गणेश विग्रहों के निर्माण पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है, चूँकि विग्रहों को अंततः जलराशि में विसर्जित होना है, तो क्यों मातृ-स्वरूपा नदियों में हानिकारक प्लास्टर को घोला जाए? सो, दक्कन की कृष्णमृदा से बने गणपति ही अत्यंत प्रचलित हैं। कुछ अपवादों में नारियल व अन्य प्राकृतिक वस्तुओं से भी विग्रह निर्माण होता है। किंतु उसके लिए न तो आर्थिक सामर्थ्य सबके पास है, न ही कला का सबको ज्ञान है। अत: वैसा मार्ग लोक के लिए दुर्गम है। तमिल में जहां तहां कृष्णमृदा के ही “मत्ति विनयकुडू” द्रष्टव्य हैं!

केरल में गणेशोत्सव का परिचय लम्बोदर पीरानाल्लु के रूप में है। आयोजन में भी दक्कन और तटीय पश्च की मिली-जुली पद्धतियाँ ही प्रचलित हैं, जिनपर स्पष्ट रूप से मराठी व कोंकणी छाप देखी जा सकती है। साथ ही, केरल स्वयं भी सुदूर दक्षिण में है। वहाँ पहुँचने तक प्रथाओं परम्पराओं को दक्कन से गुजरना पड़ता था। सो, लम्बोदर पीरानाल्लु पर पड़े कर्णाट, तेलगू और द्रविड़ प्रभाव को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।

भारतेतर गणेशोत्सव

गणेशोत्सव का आयोजन भारतभूमि की सीमाओं से परे भी धूमधाम से किया जाता है! यथा : पाकिस्तान में कराची के एक मराठी संगठन महाराष्ट्र पंचायत द्वारा आयोजित गणेशोत्सव, ब्रिटेन में विश्व हिंदू मंदिर व गुजराती हिंदुओं के द्वारा आयोजित गणेशोत्सव, जिसमें कि सहस्रों भक्तों द्वारा गणपति विग्रह का विसर्जन टेम्स व मेर्सी नदियों में किया जाता है। ठीक वैसे ही, उत्तरी अमेरिका में फ़िलाडेल्फ़िया का गणेशोत्सव, कनाडा का टोरंटो गणेशोत्सव, मॉरिशस का गणेशोत्सव व सिंगापुर की विनायगर चतुर्थी भी अत्यंत प्रसिद्ध हैं।

भारत के वन-प्रांतर में विराजने वाला समाज जिस प्रकार धर्म को सँभालता है, ठीक वैसे ही, अफ़्रीकन हिंदुओं द्वारा घाना देश में आयोजित किए जाने वाले उत्सव में भी बड़ी सुंदर कबीलाई छाप देखने को मिलती है। वस्तुतः गणेशोत्सव न केवल सांस्कृतिक पुष्टि का चिह्न है, अपितु अद्यतन इस उत्सव का आर्थिक महत्त्व भी नगरीय संस्कृति में उग आया है। दक्षिण-पश्च राज्यों के मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, सूरत, बंगलूरू व हैदराबाद जैसे समृद्ध नगरों के गणेशोत्सव आयोजन का अर्थशास्त्र किसी छोटे मोटे देश के बजट से कम नहीं!

धर्म, अर्थ और कामनाओं का आधार बनकर मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाए, वस्तुतः यही तो सनातन के पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा है। ऐसे सांस्कृतिक व आर्थिक विकास एकदूजे से कंधा मिला कर अनवरत चलते रहें, यही नित्य नव्य मंगलकारी आनंद के कारण गणेशोत्सव का प्रयोजनमूलक फल होगा।

इति नमस्कारांते।

कृष्ण की लीलाभूमि वृंदावन के निवासी योगी अनुराग, एक प्रोफेशनल चेस प्लेयर हैं। तत्त्व के ध्वजतले उनका लेखन धर्म, आध्यात्म, कला, इतिहास व संस्कृति के प्रयोजनमूलक विषयों पर नियमित प्रकाशित होता है।

22 टिप्पणी on "गणेशोत्सव"

  1. साक्षात् सरस्वती… बहुत सुंदर जानकारी दी…

  2. संजय कुमार पाठक | September 10, 2021 at 10:14 pm | Reply

    आदरणीय योगी अनुराग जी एवम् इस आलेख को कोटिशः नमन गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ बधाईया आदरणीय महोदय

  3. हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक एवं रोचक आलेख

  4. Dheerendra singh | September 10, 2021 at 10:39 pm | Reply

    आपको फेसबुक पर नहीं पाकर अत्यंत निराशा होती है।
    आज यहां पढ़कर आनन्द आ गया।

  5. खूबसूरत लेख के लिए साधुवाद अनुराग जी

  6. बहुत खूब श्री गणेशाय नमः मित्र

  7. स्वागतम
    बहुत सुन्दर

  8. योगी जी़ एक भ्रांति दूर करे. जब गणेशजी को विघ्नहर्ता माना जाता है तो उन्हे एक साल के लिये विदा क्यु कर दिया जाता है. भगवान को तो परमानेंटली हि घर मे रहना चाहीये जैसे की और भग्वानो को रखा जाता है.

  9. अद्भुत

  10. बहुत सुन्दर लेख
    बहुत सी नई जानकारी मिली
    गणपति बप्पा मोरया🙏🙏

  11. अत्यन्त सुन्दर वेबसाइट है।
    हार्दिक शुभे🌹क्षाएँ

  12. बहोत ही बेहतरीन लिखा है।मुझे आशा थी कि इस लेख में सूरत और वडोदरा के गणेशोत्सव पर भी थोडा डिटेल में होगा।
    शायद आपको जानकारी नही होगी।
    बाकी सूरत और बरोडा में जो आयोजन होता है महाराष्ट्र के मुम्बई और पूना को छोड़ दे तो किसी भी शहर से बड़ा आयोजन होता है।

  13. Sanjay Kumar Swarochish | September 11, 2021 at 1:36 am | Reply

    सदा की भाँति अत्युत्तम आलेख। कुछ सूचनाएँ ऐसी मिलीं जिनकी कतई जानकारी नहीं थी। यही तुम्हारे लेखों की सबसे अच्छी बात है। शब्द-चमत्कार,सधी हुई सुंदर भाषा और प्रस्तुतिकरण तो और भी लिख लेते हैं,मगर उनमें से अधिकांश ऊपर ही सतह पर तैरते रह जाते हैं। तुम तो गहरा गोता लगाने में निष्णात हो।
    इधर शतरंज पर पिले पड़े थे। अब कुछ दिनों के लिए उसे आराम दिये हो क्या?

  14. अनुराग बहुत बढ़िया

  15. अति सुंदर

  16. Manmohan Anand. | September 11, 2021 at 7:09 am | Reply

    बहुत खूब. बस ऐसे ही लिखते रहिए.

  17. शिव कुमार सिंह | September 11, 2021 at 7:13 am | Reply

    बहुत सुंदर वर्णन।

  18. Nice…

  19. Sahil Shrivastav (Manjeet) | September 11, 2021 at 9:14 am | Reply

    प्रतीक्षा सार्थक हुईं ❤️
    अद्भुत और बेमिसाल भैया

  20. राहुल कुमार सिंह | September 11, 2021 at 10:43 am | Reply

    बहुत ही सारगर्भित लेख हमेशा की तरह

  21. बहुत सुंदर आलेख।
    शब्दों का चयन मोतियों की माला जैसा लगा..धवल माला ..या कोई रूई का फाहा ..जो उड़ता जा रहा है हवा में ..
    मोरगांव के नाम का लॉजिक भी समझ आया।

  22. Dharmendra Yadav | September 19, 2021 at 4:32 pm | Reply

    बहुत दिनों बाद अपने लिखा और क्या खूब लिखा आपसे हमेशा ऐसा ही अपेक्षा रहती है 🙏

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