जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण : सर्व-प्राचीन किन्तु अति उपेक्षित उपनिषद्

जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण ने ॐ, प्राण, ध्यान एवम् पुनर्जन्म की लोकप्रज्ञा में महत्त्वपूर्ण स्थापनाएं की हैं!

15 मिनट वाच्य
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जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण ग्रंथ को ज्ञात उपनिषदों में सर्वप्राच्य होने का गौरव प्राप्त है, किंतु फिर भी, इसका अस्तित्व सदा ही एक सघन अपारिचित्य से घिरा रहा, आम जनमानस की पहुँच से दूर रहा! चूँकि प्रतिष्ठित वेदांती अध्येताओं ने इस उपनिषद्-ब्राह्मण ग्रंथ को उपनिषद् के रूप में मान्यता देकर इसका भाष्य नहीं किया है, अतएव इस ब्राह्मण ग्रंथ के विषय की जागरूकता केवल सामवेद की जैमिनीय परंपरा से संबंधित लोगों के अतिलघु समूह तक ही सीमित रह गई है। यद्यपि जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण, उन ग्यारह प्रमुख उपनिषदों का हिस्सा नहीं है, जिन पर शांकरभाष्य की उपलब्धता है। तथापि इसके ही एक भाग की धारा 4.18-21 ने अपना पृथक् अस्तित्व ग्रहण किया और कालांतर में केनोपनिषद् नाम तले प्रसिद्धि पायी।

इस प्रसंग प्रशांति हेतु कोई स्पष्ट तर्क नहीं दिया जाता है कि समग्र जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण के स्थान पर, इसी के एक केनखंड मात्र को वेदांतियों द्वारा एक प्रामाणिक उपनिषद् के रूप में वर्गीकृत क्यों किया गया था? हालाँकि वेदांतियों का वैसा व्यतिरेक छांदोग्य उपनिषद् के प्रति नहीं दिखता, जिसने सामवेद का ही अंग होने के बावजूद प्रधान उपनिषद् का दर्जा हासिल किया। जबकि बड़ा ही अल्प विदित तथ्य है कि हमारे प्राच्य वैदिक अभिलेखों में छांदोग्य उपनिषद् को भी जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण की ही भाँति छांदोग्य उपनिषद्-ब्राह्मण कहा जाता था।1Masato Fujii, “The Gāyatra-Sāman: Chanting Innovations in the Sāmavedic Brāhmanas and Upanisad,” Zinbun 42 (2011): 31.

अपौरुषेय वैदिक ज्ञान के दृष्टा ऋषियों ने उपनिषदों की निर्मिति हेतु कुछ निर्देशों को सामूहिक रूप से सुनिश्चित किया था, जिसके अनुसार प्रत्येक उपनिषद् को किसी विशेष वैदिक शाखा के अंतर्गत ही पोषित किया जाना था। स्पष्ट है, सभी उपनिषद् अपनी बनावट में उस शाखा के गुणधर्मों से ओतप्रोत हुए, जिससे वे संबंधित थे। यही कारण है कि सर्व-प्रारंभिक उपनिषदों, जैसे कि जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण, बृहदारण्यक उपनिषद् और छांदोग्य उपनिषद् की वैदिक पृष्ठभूमि जाने बिना उनकी विषयवस्तु को समझ पाना सर्वथा कठिन है। आमतौर पर, आधुनिक वैदिक अध्येता इस तरह के वेदांत विषयक गूढ़ वर्गीकरण से अपरिचित रह जाते हैं। और ऐसे प्राच्य दुर्गों सरीखे अभेद्य ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए प्रसिद्ध वेदांती आचार्यों के भाष्यों पर ही दांव लगाते हैं। इसप्रकार की आधारभूत बेध्यानी का आरंभ सातवीं शताब्दी में वेदांतिक भाष्य-लेखन के साथ ही हुआ था। ये वो दौर था, जब उपनिषद् अपनी पारंपरिक वैदिक पृष्ठभूमि से अलग एक स्वतंत्र ग्रन्थ के रूप में प्रसारित होने लगे।

जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण, सामवेद की जैमिनीय शाखा से संबंधित है, जबकि सामवेद का सर्व-लोकप्रिय छांदोग्य-उपनिषद्, कौथुमा-राणायनीय शाखा से संबंधित है। इसी तरह, बृहदारण्यक उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से आता है और शतपथ ब्राह्मण का अंतिम अध्याय बनकर ठहर जाता है। ग्रंथों की इस वंशवृक्ष संरचना की समझ, आधुनिक वैदिक अध्येताओं को ग्रन्थ उद्गृहीत करने में भी सहायक होती है। उपनिषद् जिस वैदिक शाखा से संबंधित होता है, उसी के अनुसार निरुक्त, लोकदृष्टि और मुक्तिविधानों को प्रयोजता है।

चार अध्यायों से वाले जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण का पहला अंग्रेजी अनुवाद सन् 1896 में एक अमेरिकी संस्कृतिविद् हैंस ओरटेल द्वारा किया गया। तक़रीबन डेढ़ सदी पश्चात् भी, ये अब तक का एकमात्र अंग्रेजी अनुवाद है। सर्वप्राचीन ज्ञात उपनिषद् के रूप में अपनी प्रतिष्ठा के बावजूद, भारत में इसके अकादमिक अध्ययन की सदा उपेक्षा की गई है। उपनिषदों की पाठ्यपुस्तकों में इसका उल्लेख नहीं है। और जैसा कि पहले बताया गया है, समकालीन वेदांती विद्वान भी इसे अपने पाठ्यक्रम के हिस्से के रूप में नहीं पढ़ते पढ़ाते हैं। यद्यपि एक सकारात्मक समाचार है कि केरल के एक सामवेदिक स्कूल में जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण को पढ़ा, शोधा और पढ़ाया जाता है। तथापि अभी तक इस ख़बर की पुष्टि नहीं हुई है।

मासातो फुजी, जोकि जापानी मूल के अग्रण्य वैदिक विद्वान हैं, जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण के अब तक के सर्वमान्य विद्वान अध्येता हैं और उनके कई अत्यावश्यक शोधपत्र इस गूढ़ उपनिषद्-ब्राह्मण पर उपलब्ध हैं।2My essay draws from his research and also that of another brilliant scholar Finnian McKean Moore Gerety of Brown University.

जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण में गहरे पैठने के लिए सामवेद की गहन समझ और साममंत्रों से सम्बद्ध लाक्षणिक निरुक्त से भली-भांति परिचित होना चाहिए, विशेषतः गायत्र साम! यद्यपि इस निबंध में ऐसा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, बल्कि केवल तीन महत्त्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जहां जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण हिंदू धर्म के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है : ॐ, प्राण (श्वास) एवम् पुनर्जन्म।

वैदिक कवियों के अनुसार, कुछ शब्दों अथवा स्वनिमों का सटीक उच्चारण, हमारे भौतिक ब्रह्मांड को आकार देने अथवा बदलने तक की क्षमता रखता है। अपने आरंभिक दौर में, पूरा विश्व केवल ध्वनि मात्र था, अव्यक्त भी और भौतिक रूप में प्रस्तुत भी! सृष्टि की इस आदि ध्वनि को अक्षर, वाच और ब्रह्म कहा जाता है। ऋग्वैदिक सूत्र 10.71 व 10.125, आदिम ध्वनि वाच को ब्रह्मांड की जन्मदात्री माना कर उसकी रचनात्मक भूमिका की स्तुति करते हैं।

यद्यपि पवित्र अक्षर ॐ ऋग्वेद संहिता में नहीं मिलता है। ॐ का सर्वप्रथम उल्लेख सामवेद के पुरा-संहिता भाग में मिलता है। और ये अवधारणा इस विचार के साथ है कि यजुर्वेद से पहले सामवेद की उपलब्धता थी। वस्तुतः प्रणवाक्षर ॐ को अक्षर, वाच और ब्रह्म के तीन वैदिक संलापों में समाहित करने वाला उपनिषद्, सामवेदिक जैमिनीय ब्राह्मण ही है।3Finnian McKean Moore Gerety, “This Whole World Is Om: Song, Soteriology, and the Emergence of the Sacred Syllable” (Phd Thesis, Harvard University, 2015), 213. जैमिनीय ब्राह्मण इस विचार को भी प्रश्रय देता है कि एक ध्वनि के रूप में ॐ तीन वेदों का प्रतीक है, जोकि विभिन्न वैदिक पाठाभ्यासों की सुदीर्घ शृंखला को स्वयं के इकलौते शीर्षक तले एकत्रित करता है।4Gerety, “This Whole World Is Om: Song, Soteriology, and the Emergence of the Sacred Syllable,” 213.

एक औपनिषदिक ग्रन्थ की भाँति जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण, ॐ के सिद्धांत की तात्त्विक व्याख्या करता है और फिर उसे ज्ञानातीत तत्त्व कहकर अभिहित कर देता है। इस उपनिषद्-ब्राह्मण की स्पष्ट निर्दिष्टि है कि ॐ तीन वेदों का रस है, और अब इसके संक्षेपण की कोई गुंजाइश नहीं!

बकौल जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण :

“ॐ है : इन्द्र, कर्म, अक्षय, अविनाशी, बहुआयामी, गणनातीत, सम्पूर्ण, सर्वोच्च प्रकाशित! धार्मिकता, सत्य, भेद और निर्णय, के स्तर पर जिसका कि कोई खंडन नहीं किया जा सकता है। ये है, सर्व प्राच्य ध्वनियों में सर्व प्राचीन…”

ये समूचा संसार इस प्रणवाक्षर के धागे से ही संगठित है। एकमात्र वही समग्र विश्व को धागे की भाँति वेधकर दस गुना, हजार गुना, दस हजार गुना, सौ हजार गुना, करोड़ गुना, दस लाख गुना, सौ करोड़ गुना, अरब गुना, दस अरब गुना, सौ अरब गुना, हजार अरब गुनाप्रवाहित होता है। यथा कोई बाढ़ सभी दिशाओं में बहकर सुदूर तक व्याप्त होती जाती है, ठीक वैसे ही, प्रणवाक्षर आगे और आगे ही बढ़ता जाता है।5जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण 1.10

इतनी बड़ी संख्या के प्रयोग के साथ, उपरोक्त अनुच्छेद ब्रह्मांडीय ध्वनि ॐ की अनंत गहराई को लोक हेतु सरल बनाने के लिए, सामवेदिक चारण कवियों के द्वारा किए गए प्रयासों को भी दर्शाता है। वेदानुसार6शतपथ ब्राह्मण कांड द्वादश 5.3.3-9, ये समग्र विश्व अपने सूक्ष्मरूप से स्थूलरूप तक निर्मित हुआ है। प्रणवाक्षर सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम है, वस्तुत: ध्वनिरस है, जिससे कि ब्रह्मांड का उदय हुआ और ठीक उसी में व्याप्त भी हुआ। जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण के अनुसार, जप करने वाला व्यक्ति जीवन की यथार्थ प्रकृति को जान सकता है और ॐ के सटीक स्वर-उच्चारण व अनुवाचन के माध्यम से चिरस्थायित्व को प्राप्त कर सकता है।

प्राण व ध्यान

प्रणवाक्षर ॐ अपने दोनों रूप यानी कि ब्रह्मांडीय ध्वनि व मानवीय जापमंत्र और दोनों स्तर यानी कि सृष्टिगत व व्यष्टिगत पर प्राण के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है। ॐ के ब्रह्मांडीय कंपन के माध्यम से, प्राण संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। प्राण मनुष्य के सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों को, न केवल एक जीवित प्राणी के व्यक्तिगत प्राण के रूप में, बल्कि पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त ब्रह्मांडीय प्राण के रूप में भी नियंत्रित करता है। इस प्राण के माध्यम से, सूक्ष्मरूपी मनुष्य का सम्बंध स्थूलरूपी ब्रह्मांड के साथ संयोजित रहता है। यथा : शब्दों का संयोजन अग्नि के साथ, मन का संयोजन चंद्र और दृष्टि का सूर्य के साथ!

मनुष्य के समस्त महत्तापूर्ण प्रकार्य प्राण से प्रकटे हैं और मृत्यु के उपरांत ये व्यक्तिगत प्राण पुन: सर्वोच्च प्राण में विलीन हो जाएगा। चूँकि सर्वोच्च प्राण एक शाश्वत व्याप्ति है, जिसमें प्रत्येक को मिल जाना होता है।7Masato Fujii, “Three Notes on the Jaiminiya-Upaniad-Brahmaiia 3, 1-5,” Journal of Indian and Buddhist Studies Vol 37, no. 2 (1989): 1000.

जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण का ये प्राण विषयक शिक्षण, वास्तव में आत्मा एवं ब्रह्म के एकतावादी वेदांती विचार का प्रणेता है। यद्यपि उत्तरवर्ती उपनिषदों ने प्राण को आत्मा या ब्रह्म कहकर पुकारा है। तथापि सृष्टिगत एवं व्यष्टिगत प्राण की ये अद्भुत् अवधारणा ही उपनिषदों के भव्य सात्त्विक मीमांसा का आधार बनी।

प्राणायाम की योग शिक्षा भी प्राण आधारित है। मानव श्वास के माध्यम से, ब्रह्मांडीय प्राण को नियंत्रित करने के लिए प्राणायाम आवश्यक है। आंतरिक शुद्धि और मन की एकाग्रता, सीधे सीधे श्वास से जुड़ी है, अत: इन अभिप्रायों के लिए भी प्राणायाम आवश्यक है।

वैदिक मंत्रोच्चार व जाप से पूर्व, अभ्यासी मनुष्य द्वारा श्वास संतुलन के माध्यम से, एक प्रकार की मानसिक एकाग्रता की निर्मिति की जाती है, जोकि युक्ति कहलाती है। श्वास नियमन का कार्य, पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त श्वास के साथ, स्वयं की श्वास का परिचय कराने से सम्बंधित है। वैदिक विद्वान फ़ूजी मसातो का, साम गायन के दौरान श्वास संतुलन पर बड़ा ही स्पष्ट कथन है :

युक्ति केवल साम गायन हेतु किया गया मानसिक प्रबंधन नहीं है, बल्कि यों कहा जाए कि ये ज्ञानातीत साम का बोध प्राप्त करने की दिशा में एक प्रयत्न है। और इस बोधयत्न के साधन स्वरूप, श्वास संतुलन का कार्य भी इस लोक से परे विराजमान ईश्वरीय सत्ता से संयोजित होना चाहिए, जिसप्रकार संसार में श्वास व्याप्त है!” 8Fujii, “Three Notes on the Jaiminiya-Upaniad-Brahmaiia 3, 1-5,” 996.

औपनिषदिक एवं उत्तरवर्ती योग साहित्य, इस प्राण की सात्त्विक प्रतिष्ठा और उच्च योगानुभूति की प्राप्ति में इसकी भूमिका के गूढ़ आध्यात्मिक चिंतन से लबालब भरा हुआ है। नियमित श्वास और मानसिक एकाग्रता के साथ ॐ के वैदिक जाप का संयोजन, वास्तव में उपनिषदों व धर्मसूत्रों में योग के प्रारंभिक शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण आधार है।

पुनर्जन्म

जहां आरंभिक ऋग्वेद में पुनर्जन्म की मान्यता को अस्पष्ट रूप से संदर्भित किया गया है।9Joanna Jurewicz, “Rebirth Eschatology in the Ṛgveda. In Search for Roots of Transmigration,” Indologica Taurinensia 38 (2008). वहीं जैमिनीय परंपरा में कर्म और पुनर्जन्म की सुसंगति को बड़े ही सैद्धांतिक रूप में वर्णित किया गया है। जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण के अनुसार मृतक के सम्मुख दो मार्ग उपलब्ध होते हैं। पहला मार्ग सूर्य तक जाता है, किंतु लक्ष्य तक जाने में असमर्थ मृतक पुनश्च चंद्रमार्ग पर ही लौट आता है। चंद्रमार्ग पुनर्जन्म के साथ जुड़ा हुआ है और ये उन सभी अच्छे कर्मों व यज्ञादिक गतिविधियों का भंडार है, जो व्यक्ति ने अपने जीवन में सम्पादित किए। तो ऐसे में, चंद्रमा पर अपने सुकर्मों का रसपान कर, या कहें कि पूर्ववर्ती जन्म के अच्छे कर्मों का फल भोगते हुए, व्यक्ति पुनश्च पृथ्वी पर वापस आ जाता है। ये चंद्रमार्ग मार्ग है, उपलब्ध मार्गों में सर्वसाध्य।

द्वितीय मार्ग सर्वथा जटिल है, श्रमसाध्य है। इसमें सामवैदिक धर्माचार्यों की भूमिका भी निहित है कि वे मृतक को सूर्यमार्ग की अभिप्राय सिद्धि में सहायक होने के लिए, ठीक ढंग से साम मंत्रोच्चार व ऋचागायन करें। सूर्यपथ में मृतक एवं ब्रह्मांडीय संस्थाओं के मध्य एक संवादभी अंतर्भूत है। अंतिम लक्ष्यसिद्धि से पूर्व, मृतक विभिन्न ब्रह्मांडीय संस्थाओं से कुछ यों गुजरता है :

पृथ्वी → अग्नि → वायु → मध्यवर्ती क्षेत्र → मंडल → होरात्र → अर्ध-माह → माह → ऋतुएँ → वर्ष → स्वर्गीय गंधर्व → अप्सराएँ → आकाश → देवता → सूर्य ↔ चंद्र10Masato Fujii, “The Recovery of the Body after Death: A Prehistory of the Devayāna and Pitryāna,” Studia Orientalia, no. 110 (2011): 106.

इस पथ के अंत में मृतक सूर्य तक पहुंच जाता है, किंतु उसे सूर्य और चंद्रमा के बीच यात्रा करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है, अर्थात् मृतक के पास सूर्य यानी कि ब्रह्मलोक में निवास करने अथवा चंद्र मार्ग चुनकर पृथ्वी पर पुनश्च लौट आने का विकल्प सदा उपलब्ध होता है।

उत्तरवर्ती उपनिषदों में चंद्रपथ को पितृायण अर्थात् पितरों का मार्ग कह पुकारा जाता है, जोकि पुनर्जन्म का मार्ग है। वहीं सौरपथ को देवायण अर्थात् देवों का मार्ग कहा जाता है, जहां ब्रह्मलोक अवस्थित है, जहां पुनर्जन्म की कोई व्याप्ति नहीं। पितृायण गृहस्थ जीवन व वैदिक यज्ञों से सम्बद्धित है, जबकि देवायण की सम्बद्धता त्याग व तपश्चर्या से है। (छांदोग्य उपनिषद् 5.10)

जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण में कर्म व पुनर्जन्म पर की गई विस्तृत चर्चा, इस विषय पर की गई समग्र भारतीय मूलग्रांथिक साहित्य की प्रथम चर्चा है। अंत:तथ्य ये है कि जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण के अनुसार, प्राणी का सुकर्म मृत्योत्तर भी साथ रहता है, इसका आनंद भी लिया जा सकता है। सुकर्मों का सुख भोगने के पश्चात् पृथ्वी पर पुन: लौट आना है! उक्त सिद्धांत को, भारत के उत्तरवर्ती धार्मिक विचारों में निहित कर्म सिद्धांत की अत्यंत परिष्कृत व्याख्या के प्रथम चिह्न की भाँति देखा जा सकता है।

निष्कर्ष

इस आलेख में, साम गायन से संबंधित सभी व्याख्याओं को विनम्रतापूर्वक अभिहित नहीं किया गया है। और इनके बजाय जैमिनीय सामवैदिक परम्परा की कुछ केंद्रीकृत संधारणाओं व सिद्धांतों को अवश्य छेड़ा है, जो कहीं कहीं हिंदूधर्म का भी केंद्र बने हुए हैं। ऐसे में, जबकि आधुनिक हिंदूजन की वैचारिकी, हिंदूधर्म को एक अखंड इकाई के रूप में मानने की ओर प्रवृत्त हो गई है, वास्तविकता ये है कि व्यापक रूप से भुला दी गईं इन विशिष्ट परपरंपराओं ने ही सनातन धर्म को आधार प्रदान किया है।

साम गायन करने वाले प्राच्यजन, वस्तुतः अध्येता भी थे और रहस्यवादी भी। उन्होंने दसवीं सदी ईसा पूर्व से चली आ रही हिंदू सभ्यता की सर्वप्राच्य संगीत परंपरा को उत्तरजीवित किया। वैसी उत्तरजीविता कि भारतभूमि से प्रकटे प्रत्येक संगीत को इस साम गायन परम्परा ने प्रभावित किया है। ये सामवैदिक परंपरा ही थी, जिसने छंद, माधुर्य और भाषा के वैज्ञानिक स्वरूप की स्थापना में आधारभूत सफलता प्राप्त की थी!

सामवैदिक उपनिषद् यानी कि छांदोग्य और जैमिनीय उपनिषद्-ब्राह्मण, वस्तुतः सामवेद परंपरा के आध्यात्मिक ग्रंथ हैं। इन्होंने ॐ, उसके अंत:प्रयोजन और मन व प्राण से इसकी संबद्धता के विषय में बड़ा ही महीन किंतु स्मरणीय चिंतन किया। इस चिंतन ने न केवल ध्यानयोग के विस्तारपथ को प्रशस्त किया, बल्कि आदिम ध्वनियों से निर्गत ब्रह्मांड पर परिष्कृत व्याख्या भी प्रस्तुत की! केरल के नम्बूधारी ब्राह्मण समुदाय और शेष दक्षिण भारत के कुछ प्रकीर्णित परिवारों में, कुछ प्रशिक्षित साम गायक आज भी अपनी सहस्रों वर्ष पुरानी पारिवारिक परंपरा का रक्षण कर रहे हैं। हालाँकि, आधुनिकता बड़ी कठिनाई से ही परंपराओं के रक्षदायित्व का वहन करती है, किंतु फिर भी, इस परंपरा की उत्तरजीविता का अनवरत दर्शन ही आनंद का कारण होगा।

मनीष माहेश्वरी तत्त्व के संरक्षक व प्रधान संपादक हैं। उनका संपर्क सूत्र manish@tattvamag.org है। उनका ट्विटर हैंडल @manish_tattva है।

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