ब्रह्मा-विष्णु-महेश प्रतिमाओं की प्रतीकात्मकता एवं अभिप्राय

भक्त के भावानुरूप ध्यान हेतु आवश्यक है कि वो देवप्रतिमाओं के पार्श्व में निहित प्रतीकात्मकता और दर्शन को जाने!

8 मिनट वाच्य
Trimurti

क्या कभी आपने विचारा है कि भगवान विष्णु चक्र क्यों धारते हैं, या ब्रह्मा के चार मुख क्यों हैं, अथवा शिव के ग्रीवा में वासुकि सर्प क्यों है? हिंदू धर्म में ऐसे प्रत्येक प्रतीक तत्त्व के पार्श्व में एक नियत प्रतीकात्मक अर्थ निहित है। ये आलेख, प्रतिमा प्रतीकों के गूढ़ार्थ को ठीक वैसे ही प्रकट कर देगा, जैसे ये पाँचवीं सदी में प्रणीत विष्णुधर्मोत्तर पुराण के मूलपाठ में हिंदूकला और सौंदर्यशास्त्र के तले विस्तृत रूप से निहित हैं। विष्णुधर्मोत्तर पुराण का तीसरा खंड काव्य, गायन, नृत्य, वाद्य संगीत, वास्तुकला और देवमूर्ति निर्माण के निर्देशों पर एक विस्तृत ग्रन्थपाठ है।

चूँकि उपनिषदों में दिव्यता को निराकार, शाश्वत और अभौतिक रूप में माना जाता है, अतः एक मूर्ति के रूप में देवत्त्व की अर्चना के लिए आत्मविद्या से उपजे तर्क की आवश्यकता होती है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में, ऋषि मार्कंडेय कहते हैं कि विकृति अर्थात् स्वयं परमात्मा का रूपांतरण ही समग्र ब्रह्मांड का अभिरूप है। पूजा व ध्यान केवल तभी संभव हैं, जब ईश्वर साकार स्वरूप से संपन्न हों। परमात्मा की अदृश्य स्थिति का अभिज्ञान कर पाना दैहिक प्राणी के लिए सरल नहीं, अतएव परमात्मा को विचारने, मूर्तरूप देने और चित्त में समाविष्ट करने के लिए छवियों की आवश्यकता होती है। ठीक इसी प्रकार से, कदाचित् इसी अवधि का एक और ग्रंथ वास्तुसूत्र उपनिषद् कहता है कि प्रारम्भ में, ब्रह्म केवल एक निर्गुण अंत:शक्ति थी। ये अंत:शक्ति चराचर सृष्टि की निर्माण प्रक्रिया में प्रकट हुई, और ब्रह्म का अपने सगुण स्वरूप को लेकर प्रकटीकरण हुआ। अत: मूर्तरूप वास्तव में ईश्वर के रचनात्मक आवेग का अवक्षेपण है।

भगवान ब्रह्मा की प्रतिमा

विष्णुधर्मोत्तर पुराण की निर्दिष्टि है कि एक दक्ष मूर्ति-विशारद की सर्जना में ब्रह्मा को चतुर्मुखी, चतुर्भुज, कमल आसीन, स्याह मृगचर्म धारी, संवलित केशधारी, सप्तहंसरथ विराजित होना चाहिए। दाहिने हाथ में शुभ माला और बायें हाथ में जल कमंडल होना चाहिए। वैसी अलंकृत सुस्थिर छवि के नेत्र ध्यान में संवृत हों, कमल पंखुड़ियों के समान हों। इसके उपरांत, विष्णुधर्मोत्तर में इस प्रतीकवाद के पार्श्व कारण को अभिहित किया गया है।

चूंकि ब्रह्मा एक आद्य रचयिता हैं, अत: उनकी छवि रक्ताभ होनी चाहिए, जो उनके रजोगुण या कहें कि रचनात्मक गतिविधि का प्रतिनिधित्व करे। सृजन में दिक्-काल समष्टि की अभिव्यंजना भी निहित होती है। सो, ब्रह्मदेव की चतुर्भुजाओं द्वारा अंतरिक्ष का प्रतिनिधित्व किया जाता है, जो चार प्रमुख दिशाओं का दर्शन है : उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम।

ब्रह्मांड के भोर में प्रकटे वेदों का प्रतिनिधित्व, ब्रह्मदेव के चार मुखमंडलों द्वारा किया जाता है, जो चतुर्वेद को दर्शाते हैं : पूर्व मुख ऋग्वेद, दक्षिण मुख यजुर्वेद, पश्च मुख सामवेद और उत्तर मुख अथर्ववेद। ब्रह्मदेव की हस्तमाला, समय की रचना और उसकी गोलाकार गति का प्रतिनिधित्व करती है।

चल व अचल दोनों संसार, आद्य जल से उत्पन्न हुए हैं। अतः ब्रह्मदेव आदिकाल के जल को अपने कमंडलु में धारते हैं। निराकार ब्रह्मा ने अपनी ध्यान गतिविधि या कहें कि तप के माध्यम से सृष्टि की कल्पना की और उसके अस्तित्व को प्रस्तुत किया। इसी कारण, ब्रह्मदेव को सदा मुँदे नेत्र लिए, गह्वर ध्यान की सुस्थिर मुद्रा में आसीन एवं ब्रह्मांड को अस्तित्व में दृष्टिगोचर करते हुए ही दर्शाया जाता है।

भगवान शिव की प्रतिमा

विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार पंचमुखी शिव को वृषभासीन होना चाहिए। उनकी संवलित जटाओं के शिखर पर अर्धचंद्र हो, और उनका पवित्र यज्ञोपवीत हो नागराज वासुकि। उनका निरूपण दस भुजाओं से किया जाए। उनकी दाहिनी भुजाओं में एक एक माला, त्रिशूल, तीर, दंड और कमल पुष्प होना चाहिए। और उनके बाईं भुजाओं में एक एक नींबू, धनुष, दर्पण, कमंडलु और चर्म होनी चाहिए। संपूर्ण छवि चंद्रमा की किरणों सरीखी उज्ज्वल होनी चाहिए।

विष्णुधर्मोत्तर का शिव वर्णन मानता है कि पाठकगण शिव प्रतिमा के पार्श्व में निहित प्रतीकवाद से परिचित हैं, अत: ये अति विशिष्ट विवरणों को अभिहित नहीं करता। प्रायः शिव के पंचमुख, पंचतत्त्व के प्रतिनिधि हैं : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। नागराज वासुकि, जो उनके ग्रीवा में यज्ञोपवीत की भाँति हैं, वस्तुतः उस क्रोध के द्योतक हैं, जो त्रैलोक्य को नष्ट कर देता है। जबकि व्याघ्रचर्म इंद्रिय-संसार की तृष्णा का निरूपण है। शिव के दो नेत्र ही सूर्य और चंद्र हैं, जबकि त्रिनेत्र अग्नि हैं, जिसके माध्यम से वे संसार को भस्म कर देते हैं। कालांतर में, सूर्य, चंद्र और अग्नि की ये प्रतीक व्याख्या, हठयोग के रहस्यपूर्ण देहविज्ञान का अति महत्त्वपूर्ण सिद्धांत बन गई।

शिव की संवलित जटाएँ, वास्तव में सर्वोच्च ब्रह्म की गूढ़ाभेद्य प्रकृति का निरूपण हैं। उनके मस्तक का अर्धचंद्र दिव्य शक्तियों अर्थात् ऐश्वर्य का प्रतीक है और वृषभ चतुष्पादीय धर्म का। (हिंदूधर्म में, धर्म को चतुष्पाद कहा गया है!) माला और कमंडलु उनके तपस्वी स्वभाव के द्योतक हैं। नींबू उन परमाणुओं का चिह्न है, जो ब्रह्मांड की संपूर्णता का गठन करते हैं। (वास्तव में, ये विचार कि ब्रह्मांड परमाणुओं से बना है, हिंदूधर्म में अत्यंत पुरातन है!) जैसा कि सर्वविदित है, शिव का त्रिशूल प्रकृति के त्रिगुण का प्रतिनिधि है : सत्व, रजस् और तमस्। यही तीन परस्पर सहचर होकर, प्रकृति के गतिशील आवेग का निर्माण करते हैं। और अंततः शैवतंत्र में, प्रकृति को शिव की अनन्य शक्ति के रूप में अभिहित किया गया है।

भगवान विष्णु की प्रतिमा

विष्णुदेव की प्रतिमा की व्याख्या करते हुए, विष्णुधर्मोत्तर पुराण में कहा गया है कि विष्णुदेव को गरुड़ासीन चित्रित किया जाए। उनका वक्षस्थल कौस्तुभ रत्न के साहचर्य में आभापूर्ण हो। विष्णुदेव जल आच्छादित मेघों-से श्यामवर्णी हों, पूर्ण अलंकृत और सुंदर नील वस्त्र धारण किए हुए। विष्णुदेव वनमाला अर्थात् पुष्पों की दीर्घ माला धारते हैं, और उनके दाहिने हाथों में एक एक बाण, माला व गदा है। जबकि बाएं हाथों में एक एक चर्म, वस्त्र और धनुष हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वैसी विष्णुप्रतिमा विष्णुधर्मोत्तर पुराण के लिए विशिष्ट है। प्रायः विष्णुदेव के चार हाथ होते हैं, जिनमें कि गदा, चक्र, कमल और शंख होता है।

चूंकि सर्वोच्च का रूपांतर ही ब्रह्मांड है, अत: इसके परिवर्तन का वर्ण स्याह है, कृष्णवर्ण, काला रंग। सृष्टि अनुरक्षक का वर्ण काला माना गया है। उनके वक्षस्थल पर स्थित कौस्तुभ रत्न, शुद्ध ज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है, और उनकी देह को सुशोभित करती पुष्पों की वनमाला, सांसारिक बंधन की ओर संकेत करती है। विष्णुदेव के वस्त्र वैसी अविद्या के द्योतक हैं, जो संसार समर्थक है। सांख्य तत्त्वमीमांसा को प्रयोज कर गदा और चक्र, वास्तव में, पुरुष और प्रकृति के साझे निरूपण हैं, ब्रह्मांड के दो अप्रकाशित मूल कारण भी। इसके अतिरिक्त, विष्णुधर्मोत्तर का कथन है कि पुरुष एवं प्रकृति का केंद्रज मन, गरुड़ द्वारा निरूपित है, जो समस्त सृष्टि में व्याप्त है, जो कहीं भी तीव्रता से उड़ सकता है। विष्णुदेव के हाथ में शंख आकाश और जल का प्रतिनिधि है, जबकि कमल-पुष्प के बृहद प्रतीकवाद का हिंदूधर्म में अनन्य महत्त्व है, जिसे “तत्त्व” के एक पृथक् आलेख में अभिहित किया जाएगा।

निष्कर्ष

त्रिदेव के इतर, विष्णुधर्मोत्तर में अन्य देव प्रतिमाओं एवं उनका प्रतीकवाद भी अभिहित है। यथा : अग्नि, वरुण, कुबेर, नरसिंह, हयग्रीव, सरस्वती, संकरण, प्रद्युम्न, वासुदेव, कृष्ण, अनिरुद्ध, तुम्बुरु, और कई कई अन्य देव। एक उपासक, जो प्रतिमा के पार्श्व में निहित प्रतीकवाद व सम्यक् दर्शन को जानता है, वो अंगीकृत स्वरूप पर ध्यान करने के लिए अवश्य ही उत्तम रूप से सज्ज होगा।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण हिंदू कला का एक मौलिक ग्रंथ है। वैसा प्रथम बार हुआ था, जब संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला एवं नृत्य के लिए एक स्वतंत्र संग्रह को प्रणीत किया गया था। इसकी परिणिति के उपरांत प्रायः बारह सदियों तक, हिंदू परंपरा के सभी अभिज्ञात कला स्वरूपों को अभिहित करते हुए, अत्यंत परिष्कृत ग्रंथों एवं निर्देशिकाओं का जन्म हुआ। पाठ्यपरंपरा की वर्धमान जटिलता, आठवीं सदी के पश्चात् निर्मित स्मारकीय मंदिरों की वास्तुकला व मूर्तिकला, हिंदू संगीत एवं नृत्य रूपों के परिष्कार और रस की सौंदर्य परंपरा में स्वतः परिलक्षित होती है।

तत्त्व अवधान : इस आलेख हेतु, स्टैला क्रैमरिश द्वारा अनूदित विष्णुधर्मोत्तर पुराण का उपयोग किया है। यदि पाठकगण चाहें, तो देवी प्रियबाला शाह के अनुवाद का भी उपयोग कर सकते हैं।

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