प्राच्य भारत का शैवोत्थान व ह्रास

गुप्त साम्राज्य के निपात के साथ, शैववाद भारत का प्रमुख धर्म बन गया!

14 मिनट वाच्य
Shiva Statue

ड़ा ही अल्पज्ञात तथ्य है कि पाँचवीं से तेरहवीं सदी तक, हिंदू धर्म के भीतर सबसे प्रमुख धार्मिक परंपरा के रूप में, शैववाद (शिव धर्म) अपनी प्रधानता के चरम पर था। लगभग सहस्राब्दी समान इस अवधि में अधिकांश भारतीय राजा शैव थे, सो स्पष्ट है कि राज-संरक्षण भी शैव संस्थाओं को दिया करते थे। ये दौर समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों में शैववाद की प्रधानता का दौर था, विशेष रूप से वियतनाम के चंपा साम्राज्य और कंबोडिया के खमेर साम्राज्य में। शैववाद का ऐसा प्रभुत्व था कि बौद्धों की महायान शाखा के तमाम प्रगतिवादी अनुयायियों ने स्वयं को आगमिक तांत्रिक शैववाद के साँचे में ढाला और वज्रयान नामक एक तांत्रिक बौद्ध परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ! जैन धर्म और वैष्णववाद ने भी शैववाद की लाक्षणिक अनुष्ठान पद्धतियों को अपनी परंपरानुसार ढाल कर अंगीकार किया। शैव प्रभुत्व की इस अवधि को ‘शैव युग’1Alexis Sanderson, “The Śaiva Age: The Rise and Dominance of Śaivism During the Early Medieval Period,” Genesis and development of Tantrism (2009). भी कहा जाता है। हालाँकि, तत्समय रचित शैव ग्रंथों के विशाल संग्रह और प्रचलित शैववाद की विचित्र विविधता पर अब समय ने विस्मृति-लेपन कर दिया गया है। तथापि, पश्चिम का शैक्षणिक समुदाय, शैव चेतना के बोध विकास व अनुसंधान हेतु बड़े पैमाने पर यत्न कर रहा है।

अचंभित कर देने वाली बात यह है कि शैववाद का उदय गुप्त राजवंश के अवसान के साथ हुआ। बहरहाल, अब ये सुनिश्चित कर पाना कठिन होगा कि दोनों ऐतिहासिक घटनाओं के बीच कोई संबंध है। चूँकि समग्र गुप्तकाल पर्यंत प्रजा के बीच शैववाद एक अत्यंत लोकप्रिय धर्म था। सिवाय इस वैषम्य के, कि तमाम गुप्त सम्राट वैष्णव धर्म के अनुयायी बने रहे, स्वयं को भागवत कहते रहे! यों भी, शैवयुग की मंत्रमुग्ध कर देने वाली घटनाओं का विवरण कई श्रमसाध्य आलेखों में समेटा जा सकेगा। अतः अब आलेख की दिशा वैसे अनुरेखों की ओर मोड़ दी जाए, जहां शैव परिपाटी की सार्वलौकिकता से भी पूर्वकाल के मूलपाठ व पुरालेख विराजते हों। जहां पाँचवीं सदी के पश्चात् इसके पल्लवन की गाथाएँ निवासें। प्रमुखता से वे चिह्न, जिनकी निर्मिति पाँचवीं सदी के अंत व छठी सदी के आरंभिक दशकों में वैष्णव समाज के द्वारा शैववाद की ओर तय गई यात्रा के कारण हुई।

शैववाद की उत्पत्ति पर चर्चा करने से पूर्व, ये स्थापना आवश्यक है कि शिव शाश्वत हैं, भले उनकी पूजा किसी एक निश्चित समय पर शुरू हुई हो! शैववाद की उत्पत्ति से तात्पर्य केवल उस बिंदु से है, जहां से शिवपूजा के लिए पुरातात्विक और पाठ्य स्रोतों में पहला प्रमाण मिला करता है। इसका किसी भी तरह से ये अर्थ नहीं, कि शिव का उदय तब हुआ, जब शिवपूजा के भौतिक प्रमाण मिलें। शैववाद और शिव के इस भेद को प्रायः अनदेखा कर दिया जाता है।

प्रारंभिक शैववाद

शैववाद की उत्पत्ति पर कोई भी चर्चा पुरावैदिक प्रमाणों के उद्भेद से आरंभ होती है, जहां शिव को आदि-शिव कहकर पुकारा गया। सिंधु घाटी के आदि-शिव के शास्त्रवृत्त और कुछ सहस्र वर्ष पश्चात् उभरे शिव के शास्त्रवृत्त में अनूठी समानता है। इससे शिव के एक अवैदिक देव होने का पुख़्ता अनुमान लगाया जाता है। बहुत संभव है कि वैसा हो भी और न भी हो! चूँकि ये कोई तथ्य नहीं, मात्र एक अनुमान ही है। वैदिक साहित्य में शिव विषयक प्रथम पुष्ट प्रमाण यजुर्वेद के प्रसिद्ध रुद्र-स्तवन के रूप में उभरता है, जिसे शतरुद्रिया भी कहा जाता है। हालाँकि, इस स्तवन से वैसी कोई स्थापना नहीं होती कि वैदिक रुद्र एवं पौराणिक शिव एक समान हैं। न वैसा कोई दावा! तथापि इस बात की सार्वभौमिक स्वीकृति है कि आप्तकाल से चले आ रहे, शैव ग्रंथ-संग्रह में शतरुद्रिया का स्थान, शैववाद के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्तवनों में से एक था।

चित्र : सिंधु घाटी की लाक्षणिक छाप : शिव, पशुपति, आदि-शिव, स्रोत : विकिपीडिया

चित्र : सिंधु घाटी की लाक्षणिक छाप : शिव, पशुपति, आदि-शिव, स्रोत : विकिपीडिया

अध्येताओं के अनुसार, शैव आराधना का प्रथम वाचनिक प्रमाण पतंजलि के महाभाष्य में नमूदार होता है, जोकि ईसा से दो सदी पहले लिखा गया संस्कृत व्याकरण का एक स्मारकीय आख्यान है।2Alexis Sanderson, “The Impact of Inscriptions on the Interpretation of Early Śaiva Literature,” Indo-Iranian Journal 56, no. 3-4 (2013): 219. शिव को भगवान के रूप में पूजने वाले लोगों को पतंजलि ने शिवभागवत कहकर पुकारा है। गृहस्थों द्वारा क्रय की जाने वाली, शिव व स्कंद जैसे देवताओं की, छोटी छोटी देवछवियों का भी एक संदर्भ है। ये पुष्ट प्रमाण लगभग दो सौ वर्ष ईसा पूर्व के एक जनसमूह को लक्षित करते हैं, जिनका सामूहिक शैव व्यष्टित्व इतना प्रभावी था कि पतंजलि ने उन्हें शैवभागवत कहकर पुकार लिया।

शैव उपासना के पक्ष में प्राप्त सर्वारंभिक पुरालेख स्वातघाटी क्षेत्र से प्राप्त हुए हैं, जिनका कि समय सन् पैंसठ ई० के निकट निश्चित किया गया है। इन पुरालेखों से तस्दीक़ होती है कि उरुमुजा के पुत्र मोइका ने वहां एक शिवस्थलम् यानी कि शिवोपासना के लिए एक स्थान निर्मित किया था।3Alexis Sanderson, “The Impact of Inscriptions on the Interpretation of Early Śaiva Literature,” Indo-Iranian Journal 56, no. 3-4 (2013): 221. ध्यातव्य हो कि शिव उपासकों के नाम ईरानी शैली के हैं, अर्थात् शैववाद की सार्वलौकिकता के ऐन मौक़े पर फारसी मूल के लोग भी शिव की पूजा किया करते थे। इनके कुछ दशक पश्चात् के साक्ष्य कर्नाटक के धारवाड़ में एक खंडित शिलालेख के रूप में मिले, जहां उल्लिखित है कि सातवाहन वंश के राजा श्री पुलुमावी तृतीय के काल में चण्डशिवमहादेव नामक शिवमंदिर को राज-संरक्षण प्राप्त हुआ। इसी तरह के पुष्ट प्रमाण तीसरी सदी में भी मिले, जहां आंध्रभूमि के एक शिवमंदिर को राज्य से प्राप्त भूमि अनुदान का उल्लेख है। इसी कालखंड के दौरान, उत्तर भारत में भी चतुर्मुखलिंग अर्थात् चतुर्मुखी शिव के अनेक पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं।4Alexis Sanderson, “The Impact of Inscriptions on the Interpretation of Early Śaiva Literature,” Indo-Iranian Journal 56, no. 3-4 (2013): 221.

यद्यपि तीसरी शताब्दी से पूर्व के पुरालेख्य प्रमाण वास्तव में अपर्याप्त हैं, तथापि अलेक्सी सैंडरसन की बड़ी स्पष्ट निर्दिष्टि है कि मौर्य व गुप्त काल के बीच शिवपूजा के पक्ष में मिल भौतिक साक्ष्यों की कमी के बावजूद, शिवपूजा पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सार्वलौकिक एवं व्यापक थी। वैसे निरूपण हेतु भारत भर में पाए गए दूसरी शताब्दी ई०पू० के दानपत्र, अभिलेख व शिलालेख प्रयोजे जा सकते हैं। इनमें अंकित नामावली यथा शिवदत्त, शिवदास, शिवधारा एवं शिवरक्षित, समाज में शैव-प्रचलन का आख्यान बनती है।5Alexis Sanderson, “The Impact of Inscriptions on the Interpretation of Early Śaiva Literature,” Indo-Iranian Journal 56, no. 3-4 (2013): 222. उस अवधि के जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी शिव का उल्लेख किया गया है। ठीक इसीप्रकार, उत्तरवैदिक काल के आरंभ में एक समृद्ध मठ-परम्परा का प्रमाण मिलता है, जिसकी शैशवावस्था शैववाद की छांव में बीती, किंतु कालांतर में उसका ताल्लुक़ पाशुपतों के साथ हो गया। अंतत: चौथी सदी के पश्चात्, शिवोपासना के आधारभूत लाक्षणिक पुरालेख और पुरातात्विक व पाठ्य साक्ष्य प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

पाँचवीं सदी उत्तरार्ध से शैववाद का प्रभुत्व

उपरोक्त वर्णन के आधार पर वैसी निर्दिष्टि की जा सकती है कि पाँचवीं सदी उत्तरार्ध से भारत के प्रमुख धर्म की भाँति अभ्युदित शैववाद का आधार उत्तरवैदिक काल से पूर्व ही विस्तृत रूप से व्याप्त शैव परंपरा थी। किंतु शैव प्रभुता इस तथ्य से साथ किस विधि सामंजस्य बिठाएगी कैसे कि चौथी पाँचवीं सदी के बीच उत्तर भारत का शक्तिकेंद्र रहे तमाम गुप्तराजे भागवत थे, वैष्णव धर्म के अनुयायी! यद्यपि इस शंकावली का समाधान पाँचवीं सदी उत्तरार्ध के उत्तर भारत में घटित स्मारकीय राजनीतिक विकास में निहित है। हंस बकर ने 484 ई० से लेकर 534 ई० तक की पचास वर्षीय अवधि का वर्णन भारतवर्ष के संक्रमण काल के रूप में किया है।6Hans Bakker, Monuments of Hope, Gloom, and Glory: In the Age of the Hunnic Wars: 50 Years That Changed India (484-534) (Koninklijke Nederlandse Academie van Wetenschappen, 2017). ये संक्रमण काल ऐसे भारी बदलावों का दौर था, जो बारहवीं सदी के इस्लामिक आक्रमणों के साथ ही दुबारा देखे गए। और ऐन वही बदलाव अंततः शैव प्रभुता के अवसान भी कारण बने!

इस पचास वर्षीय अवधि पर्यंत, भारत को बारंबार हूण आक्रमण साम्राज्य का सामना करना पड़ा, जो पहले से ही स्वयं को उत्तर-पश्चिम भारत में स्थापित कर चुका था। क़रीब दो सौ वर्षों से उत्तरभारत में शक्तिशाली गुप्त साम्राज्य, हूणों के साथ हुए युद्धों से कमजोर हो गया और अंतत: 510 ई० सीई में ध्वस्त हो गया, जब तोरमाण हूण ने एरण के युद्ध में राजा भानुगुप्त को पराजित किया। गुप्त राजप्रासादों से निष्कासित उत्तरभारत, दरिद्र हो खंडहरों में जा गिरा। तोरमाण ने कौशांबी जैसे महत् नगरों का पूर्णरूपेण नाश कर दिया। अगले कुछ दशकों तक चले अनवरत युद्धकाल के पश्चात्, अंतत: दशापुरा के औलिकारा स्थापक यशोधर्मन के झंडे तले एकत्र हुए गुप्तोत्तर राज्यों ने हूणों को खदेड़ दिया। 534 ई० में मिहिरकुल हूण की हार ने, भारत में हूण क्षिप्राक्रमण के अंत को चिह्नित किया।

मंदसौर विजय स्तंभ, हूणों पर विजय उपरांत निर्मित एक प्रस्तर स्तंभ। (स्रोत: विकिपीडिया)

गुप्त साम्राज्य के पतन के कारण, वैष्णव राजधर्म को एक गहन आघात लगा। चूँकि वैष्णवों को प्रश्रय देना वाला और नतशिर धर्मनिष्ठा रखने वाला गुप्त-राजस्रोत अब सूख गया था! वैष्णव घटोत्तरी की इस अवधि ने देश के धार्मिक परिदृश्य को शैव धारा की ओर झुका दिया। यों भी, उत्तरभारत को हूण आक्रांताओं से निदान प्रदान करने वाले गुप्तोत्तर साम्राज्य, जैसे कि दशापुर के औलिकारा, कन्याकुब्ज के मौखरी, वल्लभी के मैत्रक, माहिष्मती के कलकुरी और स्थानेश्वर के वर्धन आदि सभी शैव अनुयायी थे।7Hans Bakker, Monuments of Hope, Gloom, and Glory: In the Age of the Hunnic Wars: 50 Years That Changed India (484-534) (Koninklijke Nederlandse Academie van Wetenschappen, 2017): 24. ज़ाहिर है, शैवों की प्रचंड प्रभुता का दौर आ गया। यहां तक ​​कि गुप्तोत्तर राज्यों से पराजित मिहिरकुल हूण ने भी शैवधर्म को अपना लिया।

एक अभिलेख हूणों की इस शैव संबद्धता को अभिहित करता है : “अपने कुटुम्ब की ख्याति के निर्मात्र तोरमाण का एक अतुलनीय शूरवीर पुत्र था, जिसका नाम मिहिरकुल था, जो बहुधा अपने कर्त्तव्य में ऋजु था, किंतु फिर भी, उसका नैष्ठिक झुकाव पशुपति की ओर हो रहा था!”8Cited in Hans Bakker, Monuments of Hope, Gloom, and Glory: In the Age of the Hunnic Wars: 50 Years That Changed India (484-534) (Koninklijke Nederlandse Academie van Wetenschappen, 2017): 20.

भारतीय इतिहास के इस संक्रमण काल के दौरान किस विधि तमाम गुप्तोत्तर राजवंश शैव हुए, ये अभी तक लगभग एक अनुत्तरित पहेली ही है। अध्येताओं ने कई कई सिद्धांत दिए हैं, किंतु वे सब अनुमान के ही मुताबिक बने हुए हैं। इससे अधिक संक्रमण काल के संपूर्ण धार्मिक इतिहास में पैठने हेतु अधिकाधिक भौतिक प्रमाण चाहिए। बतौर शाब्दिक शुचिता, अध्येताओं को सावधान रहना चाहिए कि “शैववाद का प्रभुत्व” शब्दबंध का अर्थ केवल इतना ही लिया जाए कि शिव को देवताओं में अग्रण्य मानने वाले राजाओं की संख्या अपेक्षाकृत ज़्यादा थी। और उसी अनुपात में शैव संस्थाओं को भी राज-संरक्षण प्राप्त था। न कि इस शब्दबंध का तात्पर्य कुछ इस तरह लिया जाए कि वैष्णववाद या अन्य धार्मिक परंपराएं ध्वस्त हो गईं अथवा संरक्षणहीन हो गईं। बल्कि शैव राजाओं ने वैष्णव मंदिरों को भी अनुदान दिया, भले शैव अनुदानों से अपेक्षाकृत कम ही था। संक्रमण काल के पश्चात् उभरे शैवयुग में कई वैष्णव राज्य भी थे। यथा बंगाल का सेन साम्राज्य और वाराणसी का गहड़वाल अथवा गहरवार वंश। यदि इस कालखंड में किसी भी प्रकार का दोयम व्यवहार हुआ होता, तो वैष्णववाद फिर से प्रमुखता प्राप्त करने में सक्षम न हो पाता, जैसा कि लगभग आठ सौ साल उपरांत संभव हुआ।

निष्कर्ष

बारहवीं सदी में इस्लामिक आक्रांताओं ने उत्तरभारत के हिन्दू शासन का पतन हो गया और इसके साथ ही, शैववाद प्रमुख धर्म नहीं रह गया।

इस समग्र हानि में भी, विशेष हानि शैव साहित्य के आगम अभिमुखों द्वारा निर्धारित शैववाद की हुई। उथले अध्येता आमतौर पर इस्लामी आक्रमण के कारण बौद्ध धर्म के विनाश की बात करते हैं, लेकिन शैववाद को भी इसी तरह के विध्वंस का सामना करना पड़ा। और ऐन वही हश्र सौरधर्म का हुआ, सूर्य की पूजा से जुड़ा हिन्दू सम्प्रदाय, जिसका पुराज्ञान अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है।

हिन्दू शासन के पतन के कारण धार्मिक प्रश्रय देने वाली राजकीय संस्थाओं का नाश हो गया। परिणामस्वरूप शैव मठ-मन्दिर और पांडुलिपियों के विशाल भंडार भी नष्ट हो गए। और अंततः शैववाद का स्थायी रूप से संकुचित हो गया। शैव अनुष्ठान पद्धतियाँ अपने अल्पस्वरूप में केवल तमिलनाडु, कश्मीर और नेपाल में ही जीवित रह गईं, इन क्षेत्रों की दुर्गमता और दूरस्थता के कारण। हालांकि शैववाद के संन्यासी स्वरूप, जैसे कि नाथ सम्प्रदाय के हठयोग ने वैष्णव प्रभुत्व पर्यंत भी प्रमुखता प्राप्त की। जब उत्तर भारत की राजनीति पूर्णरूपेण इस्लामीकृत हो गई, तब शेष बचे अधिकांश हिंदूराजे के वैष्णव थे। वैष्णववाद अपने अनंतर एक भक्ति शाखा में विभाजित हो, उत्तर की सर्वप्रमुख धार्मिक परंपरा बन गया, किंतु यह एक पृथक् निबंध का विषय है!

मनीष माहेश्वरी तत्त्व के संरक्षक व प्रधान संपादक हैं। उनका संपर्क सूत्र manish@tattvamag.org है। उनका ट्विटर हैंडल @manish_tattva है।

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