तांत्रिक हिन्दूधर्म में मंत्र एवं नाद की भूमिका

हिन्दूधर्म में मंत्र का संबंध आदिम अजन्मा शब्दों से है, जिन्हें वाच कहा गया, ब्रह्मांड के निर्मात्र!

7 मिनट वाच्य
Mantra

वैदिक काल से ही, कुछ ध्वनिप्रधान शब्द जब विशिष्ट पूर्वस्थापित प्रतिमान में पुनरुक्त किए जाते, तो वक्ता की देह और वातावरण पर एक शक्तिशाली प्रभाव माना जाता था। ये मंत्र, वाच कहे जाने वाले, ब्रह्मांड के निर्मात्र आदिम अजन्मा शब्दों के सहचर थे।

शब्दों में इस वैदिक वंशवृक्ष से आकर्ष्य, कश्मीर के पाँचवीं सदी के दार्शनिक व्याकरणशास्त्री भर्तृहरि ने स्वसिद्ध निर्दिष्टि दी कि नित्य या परम चेतना मूलरूप से शब्द-ब्रह्म थी। संसार का समग्र ज्ञान वाणी से व्याप्त होता है, और ये वाणी आद्य अजन्मा शब्द-ब्रह्म की बाह्य अभिव्यक्ति है। वे वाच के तीन स्तरों को निरूपित करते हैं : अक्षुत ब्रह्मांडीय ध्वनि के नीचे, यथार्थ के विभिन्न स्तरों से उतरते हुए सामान्य भाषण तक, जो मानव कर्ण से श्रव्य है। भाषा विज्ञान के इस ब्रह्माण्डीय सिद्धांत को कश्मीरी शैव परंपरा द्वारा लिया गया है।

कश्मीरी तंत्र परंपरा अपने अपने आरंभिक बिंदु के रूप में मानती है कि सर्वोच्च भगवान शिव वाच हैं, एक विशुद्ध संवेदी ऊर्जा, शक्ति। वाच, ध्वनिक स्पंदनों के अतिसूक्ष्म गठन में साकार होकर नाद कहलाता है! तत्पश्चात् ये नाद, ध्वन्यात्मक ऊर्जा की एक बूंद में जम जाता है और बिंदु कहलाता है। और फिर बिन्दु, विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से, कुंडलिनी के रूप में विकसित हो जाता है। अंततः, कुंडलिनी संस्कृत वर्णमाला और फिर संसार की बाह्य अभिव्यक्ति को जन्मती है।

प्रारंभ में, वाच को एक ऊर्जा या शक्ति माना जाता था। कालांतर में इसकी परिणिति शिव की शक्ति के रूप में हुई। वस्तुतः एक मंत्र और उससे उठे ध्वनि स्पंदन ही शिव की शक्ति हैं। अभिव्यक्त भाषा, शिव से प्रसर्जित ध्वन्यात्मक ऊर्जा हैं। जो व्यक्ति वाणी के नैसर्गिक स्वरूप और मन में पैठी उसकी प्रतिनिधि छवि के अस्तित्व को स्वीकार लेता है, वो मोक्ष प्राप्ति करता है। तथापि, यदि वो वाणी की नैसर्गिक प्रकृति के प्रति अनभिज्ञ है और स्वर-शब्दांशों के विविध बाह्य-विन्यासों में संपाशित है, तो अवश्य ही वो देहांतरण के चक्र बंधन में है।

मनुष्य के दैनिक जीवन में, शब्दों का आंतरिक प्रभाव सर्वविदित है। एक प्रशंसा उसकी चित्तवृत्ति में उल्लास भर देती है, जबकि कठोर शब्द आवेग। वस्तुतः, भाषा की शक्ति मनुष्य को उस निर्मित विचार से बांधती है, जो स्वयं भाषा ने ही उस मानस में निर्मित किया है। किंतु, यदि वाक्-शक्ति का प्रणालयन, मंत्र के रूप में किया जाए, तो भाषा अवश्य ही मुक्ति का कारण बनेगी। श्वास की लय के अनुरूप मंत्र का जाप, मनुष्य का सम्बन्ध उसकी चेतनाओं के स्पंदन से स्थापित करता है।

मंत्र शब्दबंध मनन और त्राण शब्दों के योग से बना है। “मनन” का अर्थ है चिंतन मीमांसा, जो इस संदर्भ में मंत्रोच्चार की निरंतर अभिज्ञता को चेतना निस्सरण के रूप में उद्धृत करता है, जबकि “त्राण” का अर्थ है संचित करना।1Mark SG Dyczkowski, The Doctrine of Vibration (SUNY Press, 1987), 200. मनन क्रिया के परिणामत: मनुष्य की चिंतनशील अभिज्ञता में क्रमिक वृद्धि होती है2Mark SG Dyczkowski, The Doctrine of Vibration (SUNY Press, 1987), 200., जो अंततः उसको स्वयं की बाधाओं और उनके द्वंद्व से उपजे भय से सुरक्षित करती है।

मंत्र का स्वसंवेद्य कोई अर्थ हो भी सकता है और नहीं भी। मंत्र सिद्धांत, दैनिक वार्ता रीति का अनुसरण करने के लिए बाध्य नहीं हैं, और मंत्र का सम्बन्ध बाह्य अभिप्रायों से होना भी आवश्यक नहीं। मंत्र अंत:स्तल की ओर निर्देशित भाषा का एक स्वरूप है, जो अपनी ऊर्जाओं को चेतना की सर्वोच्च शक्ति से व्युत्पत्त करता है। वस्तुतः इसी से मंत्र के ध्वनि स्पंदन का आरंभिक विकास हुआ और अंततः मंत्र को इसी में अंतर्निहित भी होना होगा।

तांत्रिक शैववाद में मंत्र को देवताओं का ध्वन्यात्मक अभिमुख माना जाता है। एकाग्रता के उच्च स्तर पर, स्वयंभू मंत्र ही देवता का मूल स्वभाव है। मंत्र और देवता समान, समरूप और समरस हो जाते हैं। भले ही किसी देवता के पास सात्त्विक यथार्थ का उत्तराधिकार न हो, तो भी, मंत्र का ध्वनि अवतार वो अवश्य है, जिसका सार ही सर्वव्यापी वाच है।

सम्पूर्ण मनोयोग को चेतना की ओर निर्देशित कर किया जाने वाला मंत्रजाप, किसी भी विचारणा में लिप्त मन की स्थिरसिद्धि हेतु स्वयंभू पर्याप्त है। चेतना से उपजे विचारों को पुन: उसी मूल में आत्मसात कर देने वाला प्रबंधन मंत्रोच्चार है। इसी प्रकार से, वाक्-शक्ति को माध्यम बनाने वाला एक साधक, परम यथार्थ की अंत:अनुभूति प्राप्त करता है।

वस्तुतः वाच ही चैतन्य पुंज में निहित विशुद्ध अंत:जागृति है। कश्मीरी शैव परंपरा में, भाषा के उच्चतम स्तर या कहें कि परा-वाच शब्द का अभिज्ञान स्पंद से किया जाता है, चेतना का नाड़ी सरीखा नित्य स्फुरण। उत्पलदेव लिखते हैं, कि सर्वोच्च वाच्य अर्थात् परा-वाच ही चेतना है। ये आत्म-जागृति है, जो स्वतः जन्मती है, सर्वोच्च ईश्वर का स्वांत्रत्य और संप्रभुता भी यही है।”3Cited in Dyczkowski, The Doctrine of Vibration, 196. वाक् की सर्वोच्च लोकोत्तर अवस्था से इसके सुबोधगम्य स्वरूप में आने तक, इसमें क्रमिक विकास के विभिन्न चरण आते हैं, ठीक वैसे ही, जैसे कि भौतिक ब्रह्मांड के सांख्य-प्रेरित प्रतिदर्श में वर्णित है।

निष्कर्ष

आलेख में, तांत्रिक हिंदूधर्म में ध्वनियों और मंत्रों की मौलिक भूमिका का संक्षेप में वर्णन किया है। ये एक बृहद विषय है, और अंततः वाच और मंत्र पर एक पूरी शृंखला यहाँ लिखी जाएगी। हालांकि, इस विषय की और भी अधिक गह्वर बूझ में रुचि रखने वाले पाठक, आंद्रे पैडॉक्स की अत्यंत विद्वतापूर्ण सर्जना में उतर सकते हैं : “वाच – द कॉन्सेप्ट ऑफ़ वर्ड इन सिलेक्टेड हिंदू तंत्र”। विशेषत: कश्मीर शैवतंत्र में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए, मार्क डाइज़कोव्स्की की शास्त्रीय पाठ्यरचना “द डॉक्ट्राइन ऑफ़ वायब्रेशन” की अनुशंसा की जानी चाहिए।

हिंदूधर्म में तांत्रिक चिंतन की व्यापक उपस्थिति होने पर भी, इसे समकालीन हिंदुओं के बीच वैसी मान्यता नहीं मिली है, जैसी कि इसकी पात्रता। इसमें भी सर्वोपेक्षित अद्वैतवादी तंत्र रहा! पाँचवीं से तेरहवीं सदी तक, तांत्रिक शैववाद ही हिंदूधर्म का सर्वप्रमुख अभिमुख था। इसी कालखंड को “शैवयुग” भी कहा जाता है।4Cited in Dyczkowski, The Doctrine of Vibration, 196. उन्नीसवीं सदी के अंत तक, तांत्रिक अभ्यासी तंत्र की गहन धार्मिक निर्देशिका निर्मित कर रहे थे, यथा सन् 1820 ई० में रामतोष भट्टाचार्य का “प्राणतोष” और सन् 1889 ई० में राजा देवानंदन सिंह का “शक्तिप्रमोद”।

हालाँकि, कई देवताओं, मंत्रों, मुद्राओं एवं तंत्र की गुप्त प्रकृति के उपयोग को अंग्रेजों और आंग्लिकृत हिंदुओं द्वारा अत्यधिक संदेह की दृष्टि से देखा गया। किंतु फिर भी, बीसवीं सदी के आरंभ में, आर्थर एवलॉन और गोपीनाथ कविराज के अग्रण्य तांत्रिक अध्ययन ने, प्राच्य हिंदूग्रंथों की विपुल संपदा में से कुछ की बोधगम्य उपलब्धता, भारतीय और पश्चिमी पाठकों हेतु सुनिश्चित की। विगत कुछ दशकों में हुए हठ-योग के पुनरोदय ने, तंत्र अध्ययन और योग के तांत्रिक आधार की ओर विश्वभर का ध्यान आकर्षित किया है। ये हिंदूतंत्र के भविष्य की दृष्टि से अच्छा संकेत है।

मनीष माहेश्वरी तत्त्व के संरक्षक व प्रधान संपादक हैं। उनका संपर्क सूत्र manish@tattvamag.org है। उनका ट्विटर हैंडल @manish_tattva है।

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