प्रस्तरों में योग : योगमुद्राओं के सर्वारंभिक पाषाणशिल्प

समूचे भारत के सैकड़ों मंदिरों में, योगमुद्राओं का एक बृहत् भंडार विस्मृत हुआ पड़ा है। उसका शतांश इस आलेख में प्रस्तुत है!

10 मिनट वाच्य

नाथ संप्रदाय योगियों की एक सहस्राब्दी प्राचीन शैव तपस्वी परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि संप्रदाय की स्थापना ग्यारहवीं से बारहवीं सदी में तत्समय की विभिन्न तंत्र व शैव परंपराओं के एकीकरण से हुई थी। नाथ संप्रदाय का भौगोलिक प्रसार बृहद है, नाथ मठ-मंदिर अफगान से बंग तक और नेपाल से तमिल तक पाए जाते हैं। नाथ परम्परा में, महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ और महायोगी गोरक्षनाथ, सम्प्रदाय के प्रमुख योगियों के रूप में सर्वसम्मानित हैं। परंपरागत रूप से, महायोगी गोरक्षनाथ को महायोगी मत्स्येंद्रनाथ का शिष्य माना जाता है।

जैसा कि असंख्य साहित्यिक और पुरातात्त्विक अभिलेखों से सिद्ध होता है, नाथ योगी हठयोग अनुशीलनों के अग्रदूत थे। योगासनों के कुछ ज्ञात चित्रण नाथ मठ-मंदिरों में प्रायः दृष्टव्य होते हैं। इनमें से कतिपय आसन हमारे पाठ्य अभिलेखों में पर्याप्त विलंब से प्रकट होते हैं। इसके इतर, विहित हठयौगिक बंध – यथा मूलबंध, जालंधरबंध, और उड्डयनबंध – सर्वप्रथम नाथ ग्रंथों में ही दृष्टिगत होते हैं, जैसे कि बारहवीं-तेरहवीं सदी का गोरक्षशतकम्। यहाँ तक कि उन्नत प्राणायाम अभ्यास, जैसे कि सूर्य, शीतली, उज्जायी और भस्त्री भी सर्वप्रथम नाथ ग्रंथों में ही प्राप्त होते हैं। हठयोग का प्रामाणिक ग्रन्थ, चौदहवीं सदी की हठप्रदीपिका भी नाथ संप्रदाय से सम्बद्ध है।

पश्चिमी भारत में नाथ योगियों के प्रारंभिक पुरातात्त्विक परिदृश्य का मानचित्रण करने वाले एक पुरातत्त्वविद् के रूप में, मराठाभूमि पर स्थित नाथ परंपरा से संबद्ध दो मंदिरों की चर्चा की जानी चाहिए, जहां पुरातात्त्विक पंजी की कुछ सर्वारंभिक ज्ञात योग मुद्राएँ प्रकटती हैं : नासिक जनपद में झोडगे का माणकेश्वर मंदिर और पुणे जनपद में पारुंडे का ब्रह्मनाथ मंदिर।

माणकेश्वर मंदिर, झोडगे (नासिक)

मालेगाँव की ईशान दिशा में, मुंबई-आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग पर माणकेश्वर मंदिर स्थित है। बारहवीं सदी के इस शिवमंदिर का निर्माण भूमिजा शैली में किया गया था। इस मंदिर की एक छवि का अभिज्ञान महायोगी मत्स्येंद्रनाथ के रूप में हो जाने के कारण, नाथ परंपरा में प्रचलित योग की प्रारंभिक गतिविधियों के काल का निश्चय किया जा सकता है। महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ की छवि के साथ, विभिन्न योग मुद्राओं को साधे योगियों की मूर्तियाँ भी हैं, यथा : कुक्कुटासन, वज्रासन, कुबड़ी आसन और ब्रह्मासन आदि।

उपरोक्त छवि देवकोष्ठ के ठीक ऊपर लगे तोरण (वृत्तखंड जैसी संरचना) में एक योगी की है। एक मत्स्य-चिह्न को योगी के ठीक नीचे उकेरा गया है, जो दर्शाता है कि ये महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ हैं। अन्य योगियों को मंदिर पर उकेरा गया है, किंतु महायोगी को देवकोष्ठ पर, जो उनके महत्त्व को दर्शाता है।1Sarde, Vijay 2019. Archaeological Investigations of The Nātha Sampradāya in Maharashtra (c.12th to 15th century CE), Unpublished thesis submitted to the Deccan College, PGRI, Pune. छवि आकार में लघु है। प्रकृति में कोमल है, कदाचित् भुरभुरी सामग्री से उत्कीर्णित। और कहीं कहीं समय के थपेड़ों से क्षतिग्रस्त भी है। महायोगी को कर्णकुंडल के साथ चित्रित किया गया है। उनका दाहिना पाँव भूमि पर स्थित है, और उनका बायाँ हाथ घुटने पर है।2Sarde, Vijay 2019. Archaeological Investigations of The Nātha Sampradāya in Maharashtra (c.12th to 15th century CE), Unpublished thesis submitted to the Deccan College, PGRI, Pune.

ब्रह्मासन/फणीन्द्रासन : इस मुद्रासन में योगी अपनी दोनों टाँगों को ग्रीवा के पार्श्व में ले जाते हैं और दोनों हथेलियाँ भूमि को स्पर्श करते हुए इस आसन को साधा जाता है। ये आसन फणीन्द्रासन, पाशिनी मुद्रा, स्कंधासन और द्विपादसीरासन के समान ही माना जाता है।

कुक्कुटासन : उक्त छवि, कुक्कुटासन में जंघा विभाग पर आसीन एक योगी की है। उन्हें अपनी जँघाओं के भीतर हाथों का सन्निवेश करते और उन्हीं पर देह को संतुलित करते प्रदर्शित किया गया है।

वज्रासन : वज्रासन में एक योगी को अपने घुटनों पर आसीन दिखाया गया है और दोनों घुटनों पर दोनों हाथ अवस्थित हैं।

कुबड़ी आसन : योगी को जंघा भाग पर आसीन कर कुबड़ी मुद्रा में चित्रित किया गया हैं। इस मुद्रा में, योगी पद्मासन में आसीन होता है और हाथों से एक कुबड़ी अर्थात् बैसाखी का आधार लेकर विश्राम अवस्था को धारण करता है।

इन प्रमुख आसनों के अतिरिक्त, इस मंदिर पर कई अन्य आसन भी उकेरे गए हैं, यथा अर्धपर्यंकासन, अर्धपद्मासन और गोमुखासन। ये हमारे पुरातात्त्विक संग्रह में योग मुद्राओं के कतिपय सर्वारंभिक ज्ञात चित्रण हैं, और यही कारण है कि ये मंदिर ऐतिहासिक महत्त्व का है। किंतु फिर भी, जीर्णता व क्षय के परिप्रेक्ष्य में मंदिर की स्थिति बड़ी ही अग्रानीत है। कदाचित्, भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तत्त्वावधान में, इस मंदिर को जीर्णोद्धार व स्थापत्य सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

ब्रह्मनाथ मंदिर, पारुंडे (पुणे)

पुणे जनपद के पारुंडे में स्थित ब्रह्मनाथ मंदिर भी प्रस्तर प्रतिमाओं के कारण पुरातात्त्विक महत्त्व का स्थान है। इन प्रस्तरों द्वारा प्रारंभिक योगमुद्राओं को प्रस्तुत किया गया है। मंदिर का नामकरण महायोगी ब्रह्मनाथ के सम्मान में हुआ। ऐसी अवधारणा है कि इस नाथ योगी ने इसी स्थान पर समाधि ली थी। मंदिर भवन के अवशेषों के आधार पर, इसे तेरहवीं सदी का माना जा सकता है। ब्रह्मनाथ मंदिर के अलंकृत स्तंभों पर विभिन्न योगमुद्राओं का दुर्लभ चित्रण हैं।3Sarde, V. & Dandekar, A. 2015. Archaeological Signatures of the Nath Cult: A Study of the Yogic postures and Rituals Depicted on the Brahmanath Temple at Parunde, District Pune. Heritage: Journal of Multidisciplinary Studies in Archaeology 3: 232-254.

बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ही किसी समय, मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था। मूर्तिकला सामग्री में से केवल छः अलंकृत स्तंभ ही अब शेष बचे हैं। इन स्तंभों का वर्गीकरण दो प्रवर्गों में किया जा सकता है : प्रथम प्रवर्ग में मंडप के मध्य भाग में स्थित चार स्तंभ शामिल हैं। और शेष दो स्तंभ, जो गर्भगृह के द्वार के दोनों ओर हैं, द्वितीय प्रवर्ग बनाते हैं। योगमुद्राओं का चित्रण, प्रमुख रूप से प्रथम प्रवर्ग के स्तंभों में ही किया गया है।

उर्ध्वधनुरासन : इस आसन को मध्य अष्टकोणीय कोष्ठक के पश्चभाग में दर्शाया गया है। छवि को पश्चगामी झुकाव की स्थिति में दिखाया गया है। मुखमंडल भूमि को स्पर्श कर रहा है, और सम्पूर्ण देह हथेलियों पर संतुलित है।

नेति क्रिया : पहले स्तंभ के नैऋत्य भाग पर दो छवियों को दर्शाया गया है, जिन्हें नेति क्रिया अर्थात् नासिका मार्ग का प्रक्षालन कहा जाता है। यद्यपि वास्तविक क्रिया का चित्रण एक ही है, तथापि उन्हें विभिन्न मुद्राओं में आसीन उकेरा गया है।

नौकासन : इस आसन के दो चित्रण हैं, जो ईशान और उत्तरी प्रकोष्ठ की छवियों के बाईं ओर पाए जाते हैं। मुद्रासिद्धि के उपरांत, देह एक नौका के भाँति दिखाई देती है। अतः इसका नाम नौकासन हुआ।

पाद-पश्चिमोत्तासन : मध्य कोष्ठकीय स्तंभ के दक्षिण भाग पर इसे दर्शाया गया है। योगी को अपने पैरों को पूर्णरूपेण विस्तृत कर आसीन दर्शाया गया है। योगी अपने दाहिने हाथ से दाहिना पैर पकड़ कर उसी दिशा में यथासंभव झुके हुए हैं। आकृति में आए क्षय के कारण मुखमंडल वैशिष्ट्य अब स्पष्ट नहीं हैं।

अर्धमत्स्येंद्रासन : इस मुद्रा को अवर कोष्ठक के आग्नेय प्रकोष्ठ पर उकेरा गया है। योगी को बैठा हुआ दर्शाया गया है। उनका बायां पैर उनके दाहिने पैर के ऊपर से क्रूश करते हुए पार्श्व की ओर प्रवृत्त है। वे अपने दाहिने पैर पर स्थित प्रतीत होते हैं। देह का घुमाव बाईं ओर है। उनका दाहिना हाथ उनके बाएं पैर के पास है, जबकि बायां हाथ ऊपर की ओर। उनका मुखमंडल पश्चगामी मुड़ाव लिए है। उनके केश आम्लान हैं, कदाचित् एक धागे में बंधे हुए! जैसा कि नामकरण है, इस मुद्रा की उत्पत्ति महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ के मत्स्येन्द्रासन से हुई होगी।

भारत भर में शताधिक अतिप्राच्य मंदिर ऐसे हैं, जहाँ यौगिक मूर्तिकला के विशद भंडार विराजित है। इनमें से अधिकांश को इतिहास ने विस्मृत कर दिया है। इस आलेख में, उस भंडारण की एक संक्षिप्त झलक प्रदान की गई है। ये आश्चर्यपूर्ण है, कि योग ने दुनिया भर में अपार लोकप्रियता प्राप्त की है, किंतु फिर भी, इसके पुरातात्त्विक और साहित्यिक चिह्नों को अध्येताओं का सत्कार प्राप्त नहीं। ये मंदिर देश में आद्यांत बिखरे हुए हैं, कुछ पूर्णरूपेण खंडहर, तो कुछ नाश के विभिन्न चरणों में हैं। प्रस्तरों में उकेरे गए ये स्मारक, मानव जाति को योगियों और तपस्वियों से जोड़ने वाले सम्पर्क सूत्र हैं। इन महायोगियों ने स्वयं के सम्पूर्ण जीवन को एक तपस्या बना डाला, दिव्यचेतना से एकाकार हुए और इस प्रक्रिया में, समूची मानवता को देवत्व के निकट लाने वाले सहचर भी बने।

विजय सरडे पुणे के दक्कन कॉलेज से डॉक्टरेट कर चुके पुरातत्त्वविद् हैं। महाराष्ट्र की आरंभिक नाथ पुरातात्त्विकी, उनके शोध प्रबंध का विषय रही है।

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