बङ्ग-इतिहास

बारहवीं सदी में बङ्गभूमि का संस्कृत-पुनर्जागरण

11 मिनट वाच्य

सन् 1204 ई० में हुए तुर्क आक्रमण से ठीक पहले, बङ्गभूमि ने सृजनात्मक गतिविधियों व शास्त्रीय प्रज्ञोत्कर्ष की एक विस्मयकारी अवधि को जिया। सेन साम्राज्य के दो अन्तिम बङ्गराजे श्री बल्लालसेन और श्री लक्ष्मणसेन ने बड़ी सङ्ख्या में कवियों को राज-संरक्षण प्रदान किया, तमाम साहित्यिक कार्य राज-अनुदान तले करवाए। चूँकि वे दोनों अपने आप में महान कवि एवं शास्त्र-प्रशिक्षित विद्वान् थे, साहित्य की महत्ता को जानते थे! यह एक ऐसा युग था, जब एक राजा की विद्वता उसकी राजशाही का एक महत्त्वपूर्ण चिह्न था। ग्यारहवीं सदी के महान् राजा भोज ने वास्तुकला, सौन्दर्यशास्त्र और दर्शन…

सम्पूर्ण आलेख

सत्य की उपेक्षा मत करो। धर्म की अवहेलना मत करो। स्वास्थ्य को तुच्छ न मानो। सम्पदा की सुध टोहते रहो। वेदपाठ की गुह्य एवं लोक अवज्ञा मत करो। देव-पितर संस्कारों का तिरस्कार मत करो।

मातृ देवो भव:। पितृ देवो भव:। गुरु देवो भव:। अतिथि देवो भव:।

– सुन्दर जीवन हेतु, एक प्राच्य हिंदू परामर्श।
[ स्रोत : शीक्षा वल्ली, एकादश अनुवाक, तैत्तिरीय उपनिषद्। ]

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